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कुमाउनी के प्रसिद्ध कवि शेरदा अनपढ़ की 20 मई आज पुण्यतिथि पर कुमाउनी साहित्यकारों कवियों ने उन्हें श्रद्धांजलि देकर याद किया है आज भी उनके चाहने वालों की भरमार है यह सोशल मीडिया में पता चलता है ।अपनी भाषा बोली संस्कृति से प्यार करने वाले लोग शेरदा की स्मृतियों को अपने अपने स्तर पर साझा कर उन्हें याद कर रहे हैं ।

फ़ाइल फ़ोटो


वरिष्ठ पत्रकार चारु तिवारी ने अपने फेसबुक वॉल पर शेरदा की स्मृतियों की लंबी कहानी कुमाउनी में लिख श्रद्धांजलि अर्पित की है । जिसे हम आपके लिए हूबहू कुछ अंश प्रस्तुत कर रहे हैं …
शेरदा ‘अनपढ़’ ज्यूक कविताओं म आम लौंगनक उम्मीद कतुक भितैर तक छिं यकै उनैर सुप्रसिद्ध कविताल समझी जै सकौं- ‘औ परुआ बौज्यू चप्पल क्यै ल्याछा यस/फटफटानी होनी चप्पल कै ल्या छा यस।’ राजनीतिक व्यवस्था कं समझणंक लिजी उनैर एक कविता छू- ‘जां बात-बात पर हाथ चलनीं, उकैं कौनि ग्रामसभा/जां बात और लात चलनी, उकैं कौंनी विधानसभा/जां एक बुलां, सब सुणनि उकैं कौनि शोकसभा/जां सब बुलानी, क्वै नि सुणन, उकैं कौनी लोकसभा।’ शेरदा ‘अनपढ़’ कं याद करणंक मतलब छू आमजनौंक आवाज कैं सुणंण- ‘तुम भया ग्वाव गुसैं, हम भयां निगाव गुसैं/तुम सुख में लोटी रया, हम दुख में पाती रया/तुमार थाईम सुनुक र्वट, हमरि थाईन ट्वाटै-ट्वाट/तुम तड़क-भड़क में, हम बीच सड़क में/तुम सिंहासन भै रया, हम घर-घाट हैं भै रया।’ यूं छीं शेरदा ‘अनपढ़’ ज्यूक साहित्यिक सरोकार। 20 मई, 2012 हूं हल्द्वाणि में उनर देहांत हो।

शेरदा का जन्म 3 अक्टूबर 1933 को अल्मोड़ा जिले के मालगांव में हुआ जब वह चार साल के हुए ही थे कि पिता का साया सर से उठ गया । गरीबी की मार के चलते बच्चों के लालन पालन के लिए उनकी माता जी ने जेवर गिरवी रख परिवार को पालना पड़ा । आठ साल में ही उन्हें एक महिला अध्यापिका के घर कई वर्ष काम करना पड़ा वही से उन्हें अक्षर ज्ञान भी प्राप्त हुआ । बड़े भाई आगरा में नॉकरी करने लगे थे शेरदा आगरा चले गए । इसी बीच आगरा में उन्हें पता चला कि मिलट्री में भर्ती हो रही है वह वहां पहुच गए और भारतीय सेना की बच्चा कंपनी में भर्ती हो गए । कई स्थानों पर नॉकरी के बाद शेरदा 1962 में थे जब भारत चीन युद्ध हुआ । यहां घायलों की स्थिति देख और युद्ध की कहानियों ने उनमें लिखने की प्रेरणा जाग्रत हुई । और उन्होंने युद्ध मे शामिल सैनिकों की मुहजुबानी किस्सों को क्रमबद्ध कर एक किताब लिख डाली । ये कहानी है नेफा और लद्दाख की नामक यह पुस्तक शेरदा की पहली किताब थी । पर्वतीय समाज के लोगों को जब जब उन्होंने बड़े शहरों में जूझते देखा उनका मन द्रवित हो जाता । उस मर्म पर उनके मन मे जो भी उद्गार पैदा हुए उन्होंने उसे लिख डाला । महिलाओं की व्यथा पर उनकी किताब दीदी,बैणि” बहुत पसंद की गई । सेवानिवृत्त होने के बाद उन्होंने कुमाउनी में अपना रचनाधर्म जारी रखा । आकाशवाणी ,कैसेट्स के जरिये उन्होंने हास्य व्यंग्य के माध्यम से समाज मे चेतना प्रसारित की । वह अस्सी के दशक में पर्वतीय समाज के अकेले चहते कुमाउनी व्यंगकार रहे जिन्हें शायद मंचों से लेकर रामलीला मेलों और अन्य सामाजिक कार्यक्रमो में आमंत्रित किया जाता था:

शेरदा को पुण्यतिथि पर हिलवार्ता की ओर से श्रद्धा सुमन,नमन ।

हिलवार्ता न्यूज डेस्क रिपोर्ट

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