Breaking News

Big breaking:2023 के बाद Johnson & Johnson टेल्क पाउडर होगा बाजारों से गायब, पाउडर में कैंसर के लिए जिम्मेदार अवयव मिलने के बाद भरना पड़ा भारी जुर्माना,पूरी खबर पढिये@हिलवार्ता Good initiative : रामनगर स्थित public school ने उत्तराखंड के आजादी के नायकों की फ़ोटो गैलरी बनाकर की मिशाल कायम,खबर विस्तार से@हिलवार्ता Big Breaking: उत्तराखंड के लाल लक्ष्य सेन ने commenwealth games का स्वर्ण पदक जीत रचा इतिहास,पूरी खबर@हिलवार्ता उत्तराखंड : दुखद खबर: उत्तराखंड क्रांति दल के पूर्व कार्यकारी अध्यक्ष हरीश पाठक का निधन, पूरी जानकारी @हिलवार्ता Haldwani धरना अपडेट :सिटी मजिस्ट्रेट का आश्वासन, एक हप्ते में होगा समाधान ,जलभराव से निजात के लिए चल रहा धरना स्थगित,विधायक भी पहुँचे धरनास्थल,खबर@ हिलवार्ता
ख़बर शेयर करें -

उत्तराखंड में भूमि कानून को लेकर मुहिम छिड़ी है । कोविड काल मे बेरोजगार हुए युवा राज्य में सख्त भू-कानून लागू करने को लेकर कैंपेन चला रहे हैं । सोशल मीडिया में चला अभियान रफ्तार पकड़ रहा है । सतारूढ़ सरकार मुद्दे के प्रति संवेदनशील हो न हो 2022 चुनाव को देखते हुए विपक्षी दल इस मुद्दे पर मुखर होने लगे हैं । हालिया कई राजनीतिक सामाजिक कार्यकर्ता भू-कानून को लेकर अपनी राय स्पष्ट कर चुके हैं ।आइये समझते हैं

उत्तराखंड में आज भी उत्तर प्रदेश के ही नियम कानूनों से चल रहा है जमीदारी विनाश एवं भूमि सुधार अधिनियम की बात करें तो यह भी मामूली संसोधनों को छोड़कर यूपी एक्ट की 1950 की कॉपी है । बीच मे कुछ संसोधन जरूर हुए लेकिन वह भी अपने हित साधन के अनुरूप ही माने जाएंगे । आइये राज्य ने हुए भू संशोधनों पर नजर डालते हैं ।


स्व नारायण दत्त तिवारी के मुख्यमंत्री के काल मे उत्तराखंड में राज्य से बाहर के लोगों के लिए राज्य में भूमि खरीद की सीमा 500 वर्ग मीटर की गई जिसका जबरदस्त विरोध हुआ लेकिन सरकार ने इसमे कोई बदलाव नहीं किया ।

वर्ष 2007 में 500 वर्ग मीटर की सीमा को घटाकर भाजपा सरकार ने 250 वर्ग मीटर कर दिया । जिसके लिए सरकार में शामिल उत्तराखंड क्रांतिदल एवं राज्य के समर्थक राजनीतिक दलों का दबाव रहा । 2007 से राज्य से बाहर के लोगों के लिए निर्धारित सीमा 250 वर्ग मीटर चल रही सीमा को भाजपा की प्रचंड बहुमत वाली सरकार ने 6 अक्टूबर 2018 को समाप्त करने की घोषणा कर दी । देहरादून में बहुप्रचारित उद्योग मित्र मीट में राज्य में करोड़ों के निवेश का वास्ता देकर त्रिवेंद्र सरकार ने जिलाधिकारियों को 100 बीघा तक बंजर जमीन उद्यमियों को आबंटित करने के छूट दे दी गई ।

राज्य निर्माण के बाद से कई संगठन उत्तराखंड में भू कानून की पैरवी करते आए हैं राज्य निर्माण में शामिल यूकेडी, उत्तराखंड परिवर्तन पार्टी, उत्तराखंड विकास पार्टी सहित दर्जनों फ्रंटल संगठन समय समय पर राज्य के लिए अन्य हिमालयी राज्यों की तर्ज पर सख्त भू कानून की मांग करते आए हैं ।
कुमायूं और गढ़वाल में हिमालयी राज्यों की तर्ज पर कानून की मांग राज्य निर्माण से पहले से की जाती रही है पर्वतीय क्षेत्रों में अंधाधुंध खनन और बड़े निर्माणों सहित वन संपदा को बचाने की मुहिम लगातार सरकारों को आगाह करती रही है । अस्कोट आराकोट और पंचेश्वर से उत्तरकाशी तक की यात्राओं में उत्तराखंड में भूमि प्रबंधन की जरूरी मांगें की गई है ।

राज्य में नॉर्थईस्ट और हिमांचल की तर्ज पर भू कानून की मांग में इस बार राजनीतिक दलों से पहले युवाओं द्वारा की गई है जिसकी वजह 2022 विधानसभा चुनावों से पहले राज्य की सतारूढ़ भाजपा के लिए संकट खड़ा हो सकता है । जिसकी वजह सरकार द्वारा 2018 में जामीनों की खरीद की खुली छूट देना है ।

राज्य समर्थक बार बार सत्तारूढ़ सरकारों से सख्त कानून की मांग करते आए हैं । अस्कोट आराकोट और पंचेश्वर से उत्तरकाशी तक हालिया जनजागृति हेतु की गई यात्राओं में इस कानून की मांग की जाती रही है ।
राज्य में सख्त भू कानून की मांग फिर से जोर पकड़ रही है । हालांकि मांग अभी शोशल मीडिया तक सीमित लगती है राज्य समर्थक यूकेडी और उत्तराखंड परिवर्तन पार्टी,उत्तराखंड विकास पार्टी जहां ऐसे कानून की मांग लंबे समय से करती आई है अभी हालिया,आमआदमी पार्टी सहित कांग्रेस के पूर्व मुख्यमंत्री हरीश रावत ने भू कानून को लेकर टिप्पणियां की हैं जिसके मायने आगामी चुनाव में स्पष्ट होंगे।

हालिया उत्तराखंड में भूमि कानून को लेकर युवाओं में जागरूकता फैल रही है । इसका कारण है कि कोविड 19 से बेरोजगार हुए युवा पहाड़ों की तरफ लौटे हैं , साथ ही कई परिवार स्थायी रूप से पर्वतीय क्षेत्रों में वापस लौटे हैं । रोजगार के कम होते चले जा रहे हैं, स्वरोजगार के लिए कृषि बागवानी के शिवा कोई चारा नहीं है ऐसे में अपनी जमीनों के संरक्षण को सख्त भू कानून की मांग जोर पकड़ रही है । कोविड काल मे बेरोजगार हुए युवा आलोक बिष्ट कहते हैं कि राज्य में पर्यटक स्थलों के आसपास अगर वह कोई रोजगार करना भी चाहें तो उन्हें जमीन उपलब्ध नहीं है । राज्य में बाहरी हस्तक्षेप की वजह उनकी स्वरोजगार की संभावनाएं समाप्ति के कगार पर हैं इसलिए इस मुहिम को सभी राजनीतिक दलों को मिलकर प्राथमिकता से हल करना चाहिए ।

मुम्बई से लौटे ललित पांडे कहते हैं बिखरी हुई जोत की वजह उसकी दिक्कतें बरकार हैं ललित कहते हैं सरकार सख्त भू कानून के साथ साथ अनिवार्य चकबन्दी भी करे तभी राज्य के बेरोजगार स्वरोजगार कर आत्मनिर्भर बन सकेंगे ।

हिलवार्ता एडिटर्स डेस्क

, , , , , , , , , , , , , ,
Subscribe
Notify of
guest
0 Comments
Inline Feedbacks
View all comments