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केदारनाथ मंदिर परिसर में आज कुछ अतिउत्साहित युवा श्रद्धालुओं ने ढोल की थाप पर भांगड़ा करने का वीडियो जैसे ही अपलोड किया जागरूक लोगों ने इस पर कड़ी आपत्ति दर्ज की है . वीडियो में कुछ लड़के लड़कियां मंदिर परिसर के सामने ही ढोल बजाकर डांस करते दिख रहे हैं जिसके बाद इस वीडियो को ट्रोल किया जा रहा है .पलायन एक चिंतन अभियान के रतन सिंह असवाल ने अपनी वाल पर सही लिखा है जिस स्थान पर बांसुरी के शिवा कोई भी वाद्य यंत्र बजाना वर्जित है वहां ढोल नगाड़ा बजाना कैसे हो रहा है मंदिर प्रशासन कहा नींद में सोया है .उन्होंने पर्यटन मंत्री सतपाल महाराज को टैग करते हुए पूछा है कि क्या यही है उत्तराखंड में सरकार का पर्यटन .दैनिक अखबार के पत्रकार नवल ने भी इस वीडियो को शेयर कर लिखा है कि जिस दिन बाबा केदारनाथ तांडव करने लगेंगे भांगड़ा भूलते देर नही लगेगी .

दोनो के वाल पर नजर डालिए एक बार …
भोलेनाथ की तपस्थली मे इसे अराजकता माना जाये या केदारपुरी को पिकनिक स्पॉट ?
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इनको पता होना चाहिए कि उच्च हिमालयी क्षेत्र मे सिर्फ बांसुरी को ही हिमालय का वाद्ययंत्र माना गया है और उसी के प्रयोग की इजाजत शिव ने मानव को दी है ।
भुला Naval Khali की फेसबुक पोस्ट से मेरे द्वारा उठाए गए इस वीडियो मे भांगड़े की थाप पर नाचने वाले कही से भी श्रद्धालु नही लग रहे है ।
प्रश्न यह खड़ा होता है कि क्या तीर्थ प्रोहित समाज के साथ BCTK टैम्पल कमेटी और राज्य का धर्मशवः मंत्रालय मूर्छित अवस्था मे है ?
उत्तराखंड के अंतरराष्ट्रीय पर्यटन मंत्री Satpal Maharaj कही आपका डार्क टूरिज्म भांगड़े के केंद्रबिंदु पर आधरित तो नही ?

देखिये – बाबा केदार के दरबार मे चल रहा है फुल्ल भांगड़ा मनोरंजन !! जिस दिन बाबा केदार ने भी तांडव शुरू कर दिया तो क्या होगा ??
2013 आपदा के समय ये हनीमून पॉइंट बना दिया गया था … तब क्या हुआ था ??
बाबा को नृत्य तो पसन्द है पर अपने मूल स्वभाव वाला — तांडव !!
आस्था के केंद्र में मनुष्य शांति के लिए जाता है न कि ऐसे सपना चौधरी वाले भांगड़ा के लिए ।।।
उच्च हिमालयी क्षेत्र में उच्च ध्वनि वाले ऐसे वाद्य यंत्र इको सेंसटिव जोन के लिए भी खतरा ही हैं ।
इस पोस्ट को इतना शेयर करें कि प्रशासन इन चीजों पर रोक लगाए ।।
इन दोनों जागरूक नागरिकों के अलावा भी सैकड़ों लोग इस वीडियो पर आपत्ति दर्ज कर चुके हैं कि मंदिर परिसर में यह सब कैसे हुआ,उच्च हिमालयी छेत्र में इस तरह के क्रियाकलाप की जानकारी नहीं होने के कारण ही यह सब किया गया, बताया जा रहा है कि जानकारी मिलने के बाद मंदिर पुरोहित सीमिति ने आपत्ति जताते हुए उन युवाओं को यह सब करने से रोक लिया, सवाल सरकार पर है आखिर उसकी जिम्मेदारी क्या है सिर्फ और सिर्फ पर्यटन के नाम पर संवेदनशील छेत्रों में किसी भी तरह का नुकसान कैसे होने दिया जाए .
पर्यावरण और हिमालयी सरोकारों से जुड़े लोग सवाल उठा रहे हैं कि औली में गुप्ता बंधुओं की 200 करोड़ रुपये की शादी करने की इजाजत देने के बाद आलोचनाओं में घिर रही सरकार आखिर अपने बेशकीमती संसाधनों को वेधने की खुली छूट कैसे दे दे रही है.
जानकर कहते हैं कि पर्यटन धार्मिक जरूर कहा जा रहा है लेकिन यह अधार्मिक की तरफ ज्यादा मुखर होता दिख रहा है लोग मंदिर में और स्वछंद जगहों का अंतर नही समझ रहे और न ही सरकार की स्वच्छ धार्मिक पर्यटन को लेकर कोई साफ सोच भी नहीं है किसी भी तरह की गाइडलाइन नहीं है जो जब चाहे चले आये, मतलब भीड़ होना ही अगर पर्यटन है तो वह दिन दूर नहीं जब इन स्थानों की महत्ता ही समाप्त हो जाए और हम हाथ मलते रह जाएं ।
केदारनाथ में 2008 तक 24 साल प्रसाद की दुकान चलाने वाले शक्ति प्रसाद साह कहते हैं कि केदारनाथ आपदा से ना ही सरकार चेत रही न ही लोग इसकी और बड़ी कीमत चुकानी होगी, उन्होंने बताया कि पहले पहले तो केदारनाथ में फ़ोटो खिंचने तक कि इजाजत नहीं थी अब आये दिन वीडियो बन रहे हैं फ़ोटो खींचने की तरकीब तो सबकी जेब मे है इससे स्थान की महत्ता कम होती है ईश्वर के प्रति आस्था खत्म होती है जिसका नुकसान उठाना पड़ेगा इसलिए सरकार को पर्यटन की ठोस नीति बनानी ही पड़ेगी .
वीडियो में दिख रहे युवाओं ने अतिउत्साहित होकर यह डांस किया है जिसकी प्रतिक्रिया आना स्वाभविक है सरकार को चाहिए कि मंदिरों में हर जगह चेतावनी के बोर्ड लगाने चाहिए जिसमें इस तरह के क्रियाकलापों पर निश्चित सजा के प्रावधान की बात कही गई हो । अगर केदारनाथ परिसर में यह स्पष्ट होता तो किसी तरह भी इन युवाओं द्वारा डांस नहीं ही किया जाता श्री शक्ति प्रसाद साह की बात को सरकार अमली जामा पहनाए तभी देवभूमि बची रह सकती है.
ओपीपाण्डेय
@ hillvarta Editors desk
हिलवार्ता न्यूज