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उत्तराखंड के 1300 हेक्टेयर जंगल आग की चपेट में हैं जबकि कोविड के दौरान 15 फरवरी 2020 से 15 जून के बीच केवल 156 हेक्टेयर जंगल आग की चपेट में आए । पिछले वर्ष का आंकड़ा पिछले 10 वर्षों में सबसे कम नुकसान वाला था ।

इस वर्ष स्थिति उलट है ,पर्वतीय लगभग सभी जिलों में जंगल आग से बर्बाद हो रहे हैं । करोड़ों की वन संपदा खाक हो गई है । सरकारें विगत 20 साल से इस आपदा से निवारण के आज तक कोई स्थायी समाधान नहीं निकाल सकी हैं । वर्तमान सरकार सब जानते हुए भी कि प्रतिवर्ष उत्तराखंड के सैकड़ों वन आग के हवाले होते आए हैं के वावजूद समय पर कोई फौरी कार्यवाही नहीं कर सकी जिसका कारण प्रदेश के जंगलों का बड़ा हिस्सा जल रहा है ।

नैनीताल,अल्मोड़ा,टिहरी,पौड़ी जिले वनाग्नि से ज्यादा प्रभावित जिले हैं । राज्य में अभी तक कुल 983 घटनाएँ सामने आई हैं लगभग 1300 हेक्टेयर वन क्षेत्र प्रभावित हुआ है । सरकार के अनुसार आज तक 40 के करीब एक्टिव फायर चल रही हैं । सरकार का दावा है कि 12 हजार वनकर्मी आग बुझाने में लगे हैं वनाग्नि से निपटान के लिए 1300 क्रू स्टेशन बनाये गए हैं लेकिन जिस तरह लगातार वनाग्नि की घटनाएं बढ़ रही है लगता नहीं कि धरातल पर उसका सकारात्मक परिणाम सामने आ रहा हो । वन मंत्री हरक सिंह रावत ने वनाग्नि बुझाने में स्थानीय लोगों को प्रोत्साहित करने के लिए एक चैनल पर बोलते हुए पुरुस्कार राशि की घोषणा भी की है । जिसमे चार डिवीजनों में उत्कृष्ट कार्य हेतु चार संस्थाओं को 51 हजार,चारों डिवीजनों में ही अन्य 10 संस्थाओं को 10 हजार रुपये । इसका किस कदर आम लोगों पर प्रभाव होगा यह जल्द पता चल जाएगा ।

उत्तराखंड वनाग्नि को लेकर हाईकोर्ट नैनीताल ने स्वतः संज्ञान लेकर पी सी सी एफ उत्तराखंड को कोर्ट में उपस्थित होने को कहा है । कोर्ट ने माना है कि मानव सहित वन्य जीवों के लिए वनाग्नि खतरा है लिहाजा इसे जल्द रोका जाना चाहिए । मामले की सुनवाई बुधवार को होनी है ।

06/04, 14:01] O P Pandey:

@हिलवार्ता न्यूज डेस्क

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