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उत्तराखंड में 2022 विधानसभा चुनावों की उल्टी गिनती शुरू हो गई है । पिछली 2017 विधानसभा चुनावों में मतदान की तिथि 15 फरवरी थी । इस बार एक दिन पहले यानी 14 फरवरी को मतदान होगा । 10 मार्च को वोटों की गिनती होगी । संभवतः शाम तक राज्य में कौन कुर्सी सम्हालेगा पता चल जाएगा ।

उत्तर प्रदेश से अलग होने के बाद राज्य में कांग्रेस और भाजपा बारी बारी कुर्सी पर काबिज होते आए हैं । वर्ष 2007 में क्षेत्रीय दल यूकेडी खंडूरी सरकार में शामिल हुई थी ।

पिछले 21 साल में राज्य में तीसरा कोई भी दल अपनी दमदार उपस्थित खड़ी नही कर पाया है इस बार भाजपा कांग्रेस को आम आदमी पार्टी ने चुनौती दी है । यूकेडी, उपपा, जैसी क्षेत्रीय पार्टियां भाजपा कांग्रेस और आप के संसाधनों के बीच संघर्ष में बनी रहें यही काफी लगता है ।

राज्य में सपा बसपा की भी लगभग हालात क्षेत्रीय दलों की तरह ही है । बामपंथी दल भी चुनाव मैदान में बिना संसाधनों के अपनी उपस्थिति के लिए संघर्ष रत दिखते हैं । कुल मिलाकर मुख्य मुकाबला कांग्रेस और भाजपा के बीच ही दिखता है । आप जरूर कुछ सीटों के नतीजों को प्रभावित कर सकती है लेकिन यह अभी साफ नहीं दिखता कि नुकसान भाजपा,कांग्रेस में किसका होगा ।

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कोविड 19 के तेजी से बढ़ रहे मामलों के बीच चुनाव आयोग ने प्रचार प्रसार में कोविड नियमों के पालन की सख्ती करने का मेसेज दे दिया है । ऐसे में भाजपा कांग्रेस के टिकट दावेदार अपना शक्ति प्रदर्शन नहीं कर पाएंगे ।

उत्तराखंड में अभी तक हुए चुनावों में लगातार कोई भी दल दुबारा सत्ता में नही आया है । बीते पांच साल में तीन मुख्यमंत्री पेश करने वाली भाजपा ने पुष्कर सिंह धामी पर दांव लगाया है । अब सवाल उठता है कि क्या धामी राज्य में चल रहे इस मिथक को तोड़ पाएंगे ।

भाजपा के तीन मुख्यमंत्री बदलने को कांग्रेस मुख्य हथियार के रूप में उपयोग कर रही है । वहीं भाजपा आल वेदर रोड ,कर्णप्रयाग ऋषिकेश रेल लाइन , देवस्थानम बोर्ड पर रोलबैक को मुद्दा बना रही है । हालिया प्रधानमंत्री के हलद्वानी दौरे में भाजपा का चुनाव एजेंडा साफ नजर आता है कि भाजपा चुनाव प्रचार में कांग्रेस की नाकामियों को गिनाते हुए आगे जाएगी । यहां प्रधानमंत्री और मुख्यमंत्री दोनों नाम लिए बगैर हरीश रावत को कोसते नजर आए ।

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उधर कांग्रेस लंबे समय से अनमने मन से ही सही किसी तरह रेस में बने रहने के लिए हलद्वानी देहरादून सहित पर्वतीय क्षेत्रों में ठीक ठाक भीड़ जुटाकर  सभाएं कर चुकी है । पार्टी ने अपने पुराने सहयोगी यशपाल आर्य को वापस लाकर बाजी पलटने का संदेश भी दिया है लेकिन नेतृत्व को लेकर वहां घमासान बना रहा । दिल्ली के हस्तक्षेप के बाद मामला शांत लगता है लेकिन सत्ता के लिए जो करेंट पार्टी में चाहिए था उसकी कमी लगातार दिखाई देता है । हालांकि कांग्रेस की देहरादून और हलद्वानी रैली में उमड़ी भीड़ सत्ता परिवर्तन के संकेत जरूर दे गई ।

कांग्रेस अभी तक हुई सभाओं में बेरोजगारी  नियुक्तियों में भ्रष्टाचार नए जिलों के निर्माण , कर्मचारियों की समस्याओं सहित महगाई को मुद्दा बना रही है । इधर कांग्रेस नेता हरीश रावत के नजदीकी राज्यसभा सांसद प्रदीप टम्टा राजधानी गैरसैण पर मुखर दिखते हैं । उन्होंने कई बार राजधानी मुद्दे पर बेबाक बात रखी है । जानकर मानते हैं कि अगर कांग्रेस अपने चुनावी वादे में गैरसैण को शामिल कर ले तो बाजी बदलने में देर नही लगेगी ।

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बहरहाल मतदान तिथि नजदीक है । यूकेडी कांग्रेस और आप ने अपने एक तिहाई उम्मीदवारों की घोषणा कर दी है वहीं भाजपा ने अभी अपने पत्ते नही खोले हैं । हर बार की तरह इस बार भी टिकट को लेकर दोनों बड़े दलों में घमासान का अंदेशा है ।

कुल मिलाकर उत्तराखंड में जिन मुद्दों पर आने वाले समय पर विपक्षी पांच साल से सतारुढ़ दल को घेरेंगे उनमें बेरोजगारी, महगाई,गैरसैण स्थायी राजधानी, भू कानून, प्रमुख होंगे । चुनाव आयोग द्वारा 15 जनवरी तक रैलियों सभाओं पर रोक लगाई हुई है । जैसे ही प्रचार प्रसार शुरू होगा निश्चित ही इन मुद्दों लंबे समय से नजर गड़ाए हुए विपक्ष हमलावर होगा । या इसके इतर व्यक्तिगत आरोप प्रत्यारोप तक सीमित रहेगा यह देखना होगा ।

कुल मिलाकर गैरसैंण, भू कानून , महगाई, बेरोजगारी यह चार बड़े मुद्दे चुनाव दौरान उठने की बात जानकर मानते हैं ।

ओ पी पांडे @ एडिटर्स डेस्क

हिलवार्ता न्यूज 

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