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नेता चाहे विकास का लाख ढिंढोरा पीटते रहें भारत के ग्रामीण इलाके अभी भी देश की मुख्यधारा में शामिल नहीं हो पाए हैं, क्या है कहानी चंपावत से वरिष्ठ पत्रकार दिनेश चंद्र पांडे की रिपोर्ट पढ़ते हैं ….
उत्तराखंड के सीमावर्ती जिले चम्पावत के तल्लादेश क्षेत्र के आधा दर्जन गांवासियों का”सड़क के लिए “वोट का वहिष्कार” सरकारी नीतियों पर प्रश्नचिन्ह ही नहीं लगाती हैं यह सरासर शर्मसार करने वाली बात है ।
स्थानीय लोग वर्षों से सड़क की मांग कर रहे हैं हर तरफ से निराशा मिलने के बाद अब मुखर हो दो हाथ करने को तैयार हैं, कहते हैं हाथ जोड़कर वोट मांग रहे नेताओं, और प्रशासनिक अमले को उनकी मांग पर विचार करने को बाध्य करंगे, वो पहले हमारी बात का संज्ञान लें, जो आज लोकतंत्र की मजबूती के लिए जनता के आगे गिड़गिड़ा रहे हैं शत प्रतिशत मतदान की अलख जगाने की बात कर रहे हैं.
स्थानीय लोगों ने कहा है कि एक ओर “मिशन मंगल”की बात हो रही है,वहीं सीमांत के इन ग्रामीण इलाकों में सामान्य सुविधाओं तक का अभाव देश के लिए शर्म की बात है,लोकतंत्र के लिए चुनाव में जाना नितांत आवश्यक है लोग मजबूर हैं कि अपने हक के लिए का इस तरह का निर्णय लेना पड़ रहा है मंगल की खुशी संग जनता की मांग पूरी हो वरना जनता के लिए जानबूझ अमंगल किया जा रहा समझा जाएग । इस बार वोट मांगने गांवों में आने वाले लोगों से लोग सवाल कर रहे हैं कि क्षेत्र की अनदेखी क्यो हुई ,अब किस मुह से जनप्रतिनिधि उनसे मत मांग रहे हैं आंखिर चुनाव के वक्त ही क्यों सारे मुद्दे क्यों समझ में आते है । उसके बाद क्यों पलटी मार लेते हैं,
इन आधा दर्जन से अधिक गांवों के लोगों का कहना है कि उनकी मांगों से नेता परिचित नहीं है ऐसा नहीं है हर बार कहा जाता है लेकिन बस अपना काम बनता, भाड़ में जाये जनता__वाली कहावत ही साफ दिखती है ।
चम्पावत लोहाघाट विकास खंड और नेपाल सीमा से लगे इलाके भंडारबोरा, रौकुवर,बिल्हेडी,बुंगाचौकुनी,सेरी,बरनौली,सरस्यूडा,पाली और कंजागल के ग्रामीणों ने एक स्वर में ऐलान है कि वोट चाहिए तो नेता व अफसर गाडी से आऐं । वरना इस बार ईवीएम खाली जाएंगे कोई भी स्थानीय जन बटन नहीं दबाएगा ।
ग्रामीणों ने बकायदा चुनाव बहिष्कार के पोस्टर बैनर अपने इलाके में जगह जगह लगाए हुए हैं,स्थानीय लोगों ने सीमांत छेत्र के विकास,के लिए केंद्र,राज्य सहित जिला योजनाओं में कमीशन और भ्रष्ट्राचार का आरोप लगाते हुए कहा है कि छेत्र नेताओं और अफसरों की कमाई के भेंट चढ़ गया है,सड़क ना होने की वजह चिकित्सा स्वाथ्य, शिक्षा में भी इलाका पिछडेपन का शिकार है।
भले ही सरकार द्वारा योजनाओं के क्रियान्वयन को लेकर समाज के अंतिम व्यक्ति को लाभ देने का ढिढोरा पीटा जाता हो। पर हकीकत में ऐसा हुआ कहीं दिखता नहीं है । लोग कहते हैं प्रशासनिक इकाई के छोटे कर्मचारी इन इलाकों का यदा कदा दौरा कर लिया करते हैं जबकि पैदल मार्ग की डर से जनपद बनने के बाद भी प्रशासन का कोई बडा अधिकारी शायद ही आज तक इन इलाकों में पुहचा हो ।
अब जब सड़क नही तो वोट नही” का नारा उठने के बाद प्रशासन के हाथ पांव फूले हैं, अब प्रशासनिक अमला में थोडी हरकत दिखाई दे रहा है जो काम पहले ही हो जाना था उसकी चिंता करके अब कितना कुछ हो पायेगा देखना होगा,अब कैसे भी बहिष्कार को कैसे टाला जाए इस पर मंथन हो रहा है ।
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दिनेश पांडे
वरिष्ठ पत्रकार
चंपावत ।
@Hillvarta. com