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उत्तराखंड में उद्योग धंधों की स्तिथि बहुत दयनीय है यहां तराई की बेसकीमती जमीन,हरिद्वार के कुछ हिस्से में एनडी तिवारी के प्रयास से सिडकुल की स्थापना ने कुछ लोगों को रोजगार जरूर दिया, लेकिन सरकारों ने श्रम कानून इतने लचर उधोगो के पक्ष में बना डाले कि कर्मचारियों को न्यूनतम बेतन भत्ता मिल भी रहा है इसकी निगरानी की जरूरत ही नही हुई ,आये दिन हड़ताल को लेकर युवा सड़कों पर रहते हैं ।
पिछले कुछ दिन से इसी तराई दो बड़े उद्योगों के बंद होने से राज्य और केंद्र सरकार की मेक इन इंडिया और रोजगार देने के वायदों पर पलीता लगा है पहला मामला डेल्टा कंपनी का है जिसको उसके मालिकान ने रातोंरात बंद कर दिया ,हाल मामला एच एम टी कारखाने का है । कांग्रेस सरकार में बनी इस फेक्ट्री को कल केंद्र के उधोग चलाने न चलाने वाली समिति के आदेश के बाद बंद कर दिया गया, अस्सी के दशक में उत्पादन की दृष्टि से रानीबाग नैनीताल में स्थित यह फैक्ट्री प्रथम स्थान पर रही ।
हल्द्वानी सहित पहाड़ की इकोनॉमी में इसके योगदान को भुलाया नही जा सकता है 1250 के आसपास कर्मचारी अपने परिवार सहित कई लोग इस उद्योग से अपनी रोजी रोटी चला रहे थे , अप्रत्यक्ष रूप से हजारों लोगों को इस उद्योग ने सालों अपने इर्द गिर्द जोड़े रखा,स्थानीय लोगों की देश के अलग अलग हिस्सों में पहचान बनाई ,पढे लिखे युवाओं को देश के कोने कोने जाकर अपनी प्रतिभा दिखाने का मौका दिया ,
नई आर्थिक नीतियों के कारण स्थानीय उदपाद कॉम्पिटिशन में आ गए धीरे धीरे घड़ियों की मांग कम होने से यह उद्योग मरता चला गया । नीति निर्धारण करने वाले जनप्रतिनिधियों की बेरुखी के चलते कोई नया आइडिया नहीं पैदा हुआ कि इस उपक्रम को कैसे बचाया जाए ,अंततः फैक्ट्री में उच्च न्यायालय के निर्णय के बाद भी ताला जड़ दिया गया है ।
यह ठीक उस समय हुआ है जब लोकसभा चुनाव हो रहे हैं विकास के दावेदार अपने सामने ही एक बना बनाया उपक्रम बचा नहीं पाते हैं और दुबारा उन्ही वादों संग सत्ता पर काबिज होते रहते हैं ,यह विषय गंभीर है ,जानकर मानते हैं अगर आज एच एमटी जैसा ढांचा विकसित करने में एक हजार करोड़ रुपया लग जायेगा ,जब छोटे से स्टेडियम बनाने में 400 करोड़ की धनराशि लग जाती है 99 एकड़ में फैला उद्योग अनुमानित लागत से अधिक का होगा ।

वादे और वादा निभाई में स्पष्ट अंतर राजनीतिक छल प्रपंच को प्रदर्शित करता है यही कारण है कि राजनीतिक दल मुद्दा विहीन चुनाव पर भरोषा करने लगे हैं ,स्वास्थ शिक्षा रोजगार की बातों से इतर मुद्दे परोस कर जनता का ध्यान भटकाना नजीर बन चुका है बेकार मुद्दे उनकी प्राथमिकता में होते हैं जिससे कि उनके ऊपर आरोप ना लग सके ।
चुनाव लोकत्रांतिक प्रकिर्या के लिए परीक्षा है जनता राजनीतिक दलों की नीतियों और उनके आगामी और पूर्व के कामों पर अपनी राय प्रकट करती है जिससे लोकतंत्र में नेता जनउपयोगी योजनाओं को पूरा करने के लिए बाध्य होता है जनता अगर ऐसे मुद्दे पर मतदान करती है जिस पर आप अपने प्रतिनिधि को अगले पांच साल बाद मूल्यांकन न कर सके तो लोकतंत्र का नुकसान होना तय है आपके इर्द गिर्द कोई रोजगार कोई अस्पताल कोई सरकारी स्कूल नहीं होगा मान लीजिए । जिसका जीता जागता उदाहरण एचएमटी फैक्ट्री जैसे उपक्रम का बंद होना है ।
हिलवार्ता की ओर से सभी जागरूक मतदाताओं से अपील है कि अधिक से अधिक प्रश्न अपने जनप्रतिनिधियों से पूछिए मतदान कीजिये, तय कीजिये कि आपके द्वार आया कौन सा जनप्रतिनिधि है, जो आपको,समाज को , नई पीढ़ी को सही दिशा देकर देश को आगे बढ़ाने में योगदान करेगा ।
Hillvarta desk
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