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उत्तराखंड : 21 साल का हुआ राज्य,स्थायी राजधानी, परिसम्पत्तियों का बटवारा,पलायन,जैसी मूलभूत समस्याएं जस की तस,विस्तृत रिपोर्ट@हिलवार्ता

उत्तराखंड : आज से ठीक 21 साल पहले 9 नवम्बर 2000 को उत्तराखंड राज्य अस्तित्व में आया । प्रदेश की धामी सरकार राज्य स्थापना दिवस के अवसर पर कई  कार्यक्रम कर रही है जिसमे वर्तमान सरकार द्वारा  85 हजार करोड़ के विकास कार्य किए जाने, कोविड टीकाकरण, आल वेदर रोड, सहित सड़कों का निर्माण,एयर कनेक्टिविटी,गैरसैण को ग्रीष्म कालीन राजधानी की घोषणा को अपनी उपलब्धि कहा जा रहा है ।

वहीं दूसरी मुख्य विपक्षी पार्टी 2021 चुनावों के मद्देनजर चुनावी रणनीति बना रही है कांग्रेस के प्रदेश अध्यक्ष गणेश गोदियाल का कहना है कि कांग्रेस ने राज्य में विकास की नींव रखी एनडी तिवारी सरकार में वर्तमान सरकार की अपेक्षा अधिक काम हुए ।

राज्य आंदोलनकारी राज्य के सत्तारूढ दोनों कांग्रेस और  भाजपा के विकास के दावों को नकारते आए हैं । यूकेडी के नेता काशी सिंह ऐरी  जहां राज्य की स्थायी राजधानी निर्माण को प्राथमिकता देते हैं वहीं उपपा के पीसी तिवारी भी स्थायी राजधानी को राज्य की परिकल्पना से जोड़कर देखते हैं । उनका कहना है कि किसी भी राज्य के विकास की परिकल्पना स्थायी राजधानी के वगैर अधूरी है ।

राज्य बने 21 साल हो गए लेकिन राज्य की स्थायी राजधानी की राह अभी तक तय नहीं हो पाई । लंबे संघर्ष से मिले पर्वतीय राज्य की मूल समस्याओं पर काम का कोई अता पता नहीं वरन उत्तर प्रदेश के समय मे बने स्कूल अस्पताल खंडहर में जरूर तब्दील हो गए । इसी अव्यवस्था के शिकार पर्वतीय जिलों से अधिसंख्य लोग जिनमे अलमोड़ा पौड़ी जिलों से सबसे ज्यादा लोग पलायन कर गए  ।

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21 वर्षों में जहां उत्तर प्रदेश से परिसीमन का बटवारा नही हो सका वहीं मूलभूत जरूरतों की खुलकर अनदेखी से प्रसव पीड़ा के चलते सैकड़ों गर्भवती महिलाएं काल का ग्रास बन गई । 21 सालों में एनडी तिवारी के समय बने सिडकुल से रोजगार की उम्मीदें जगी लेकिन युवाओं को श्रम सम्मत पगार नही मिल पाई । 21 वें वर्ष तक पहुचते पहुचते एक तिहाई औद्योगिक इकाइयां कर का लाभ लेकर रफू चक्कर ही गई । ग्रामीण स्तर पर बने बनाए स्वास्थ्य ढांचे की अनदेखी कर उसे ध्वस्त कर दिया गया । निजी क्षेत्र को खूब लाइसेंसिंग हुई जिससे धीरे धीरे सरकारी चिकित्सक नौकरी छोड़ निजी प्रेक्टिस में उतर गए ।

सरकार ने इन 21 साल में ग्रामीण क्षेत्र के चिकित्सालयों के बदले बड़े अस्पताल वह भी मैदानी क्षेत्रों में ख़ोलने की तरफ ज्यादा ध्यान दिया जिससे पर्वतीय क्षेत्र से बड़े स्तर पर पलायन हुआ । लेकिन बड़े अस्पताल भी डॉक्टरों के अभाव में सफेद हाथी बन बैठे । राज्य में मेडिकल कालेज बने या बनाए जा रहे हैं उनको बनने में तकीनीकी दिक्कतें हमेशा बनी रही । अल्मोड़ा मेडिकल कालेज बनने में दस साल से ऊपर लग गए । उसके सुचारू होने और मान्यता के लिए आवश्यक डॉक्टर्स की नियुक्ति किसी के बस में नही । एम सी आई के दौरे के वक्त उधार में डाक्टर नियुक्ति कर जैसे तैसे अगले वर्ष की मान्यता मिल रहे मेडिकल कालेज 21 साल में ही औंधे मुंह गिरने को हैं ।

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राज्य में बेरोजगारी चरम पर रही सिडकुल सहित राज्य के सरकारी अर्ध सरकारी विभागों में नियुक्तियां में धांधली की शिकायत आम है । सरकारी घोटालों की जांच ठंडे बस्ते में पड़ी रही । जिन अधिकारियों के खिलाफ भृष्टाचार के मामले चले उन्हें एक साल के भीतर मलाईदार विभाग मिल जाना नियति बन चुका है । छात्रवृत्ति और एन एच घोटाला इसका उदाहरण हैं ।

आए दिन हर गांव गली में डिग्री कालेज ख़ोलने की मानो रीति चल पड़ी । एनडी तिवारी सरकार में चली शिक्षा के लाइसेंसी करण की प्रक्रिया 21वें वर्ष तक पहुँचते पहुँचते दर्जनों निजी विश्वविद्यालयों जन्म करा गया ।सरकारी उच्च शिक्षण संस्थानों में बारी बारी अपने अपने चहेतों की नियुक्ति कर लेना राज्य के हुक्मरानों की बड़ी सफलता है ।
राज्य आंदोलन से जुड़ा बड़ा हिस्सा और आम नागरिक इन 21 सालों में आर्थिक, राजनीतिक रूप से पिछड़ता गया और धनबल के सहारे राज्य विरोधी सत्ता के नजदीक पहुचते गए ।और मजबूत होते गए । इन 21 सालों की एक उपलब्धि यह भी है कि राज्य स्थापना दिवस के जश्न में करोड़ों रुपये का बजट हर वर्ष खप रहा है ।

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सिंचाई विभाग उत्तराखण्ड का जनपद उधमसिंह नगर हरिद्वार एवं चम्पावत में कुल 379.385 हेक्टेयर भूमि के हस्तांतरण का मामला जहां सिंगल और डबल इंजन नही सुलझा सका । वहीं
जनपद हरिद्वार में आवासीय/अनावासीय भवनों का हस्तांतरण
गंग नहर से 665 क्यूसेक जल उपलब्ध कराना भी असम्भव बना रहा ,
जनपद उधमसिंह नगर तथा हरिद्वार की नहरों को राज्य को दिये जाने
नानक सागर, धौरा तथा बेंगुल जलाशय को पर्यटन एवं जल क्रीड़ा के लिए उपलब्ध कराये जाने को लेकर आधा दजर्न मुख्यमंत्री समझौता नहीं कर सके । टीएचडीसी में उत्तर प्रदेश की अंश पूंजी उत्तराखण्ड को हस्तांतरित करने का मामला भी अधर में ही लटक गया । इसके साथ ही
मनेरी भाली जल विद्युत परियोजना के लिए लिये गये ऋण के समाधान न हो सका । इसके अलावा परिवहन, वित्त, आवास, खाद्य एवं नागरिक आपूर्ति वन कृषि से सम्बन्धित विषयों पर निर्णय न होना कई सवाल जरूर पैदा करता है ।

राज्य आंदोलनकारी रमेश जोशी कहते हैं कि उत्तराखंड इन 21 सालों में उत्तर प्रदेश की कॉपी बनकर रह गया है । हुक्मरान और ठेकेदारों की मौज है । बड़ी बड़ी बातें काम धेले का नहीं शगल बन चुका है । बेरोजगारी चरम पर है । 21 साल पहले बना राज्य नेता बनाए जाने वाली फैक्ट्री बनकर रह गया ।

हिलवार्ता न्यूज डेस्क की रिपोर्ट 

 

 

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