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आजादी के नायक और पेशावर कांड के महानायक वीर चंद्र सिंह गढ़वाली का जन्म दिन उत्तराखंड के कई हिस्सों में मनाया जा रहा है उनके संघर्षों की लंबी फेहरिस्त है उत्तराखंड में गढ़वाली जैसा नायक यदा कदा ही जन्म लेता है उनकी वीरगाथा उत्तराखंडियों में संघर्ष की पृष्ठभूमि तैयार करती है । गलत को गलत कहने की हिम्मत दिलाती है ,संघर्षों के इन नायकों का अनुसरण कर ही राज्य के लिये संघर्षपूर्ण आंदोलन हुआ और उत्तराखंड राज्य अस्तित्व में आ पाया।

वीर चंद्र सिंह गढ़वाली का जन्म पौड़ी गढ़वाल के मासौं गांव में 25 दिसम्बर 1891 को हुआ गढ़वाली ने 3 सितम्बर 1914 को प्रतिष्ठित गढ़वाल रायफल में बतौर सैनिक भर्ती हुए उनके तीखे तेवरों को देखते हुए उन्हें हमेशा फ्रंट पर तैनाती मिली, 16 साल सेना में रहते हुए उन्होंने अनेक मोर्चो पर दुश्मन का सामना किया प्रथम विश्वयुद्ध में तीन लड़ाइयां उनके नाम रही जिसमे,फ्रांस,मेसोपोटामिया, और बगदाद युद्ध शामिल है । लेकिन जब बात निहत्थे लोगों पर गोली चलाने की आई इस नायक ने विद्रोह कर दिया ।

चंद्र सिंह गढ़वाली को 23 अप्रैल 1930 में फौजी विद्रोह में शामिल होने के कारण 11 जून 1930 को 20 साल कालापानी की सजा सुनाई गई । वीर चन्द्र सिंह गढ़वाली ऐसे व्यक्तित्व रहे जिन्होंने अप्रैल1930 में ब्रिटिश कमांडर के हुक्म की नाफरमानी करते हुए निहत्थे पख्तूनो के ऊपर गोली चलाने से मना कर दिया था सिविलियन द्वारा अंग्रेजों का विरोध आम बात थी आर्म फोर्सेज के भीतर इस तरह का विरोध सिर्फ चंद्र सिंह गढ़वाली ही कर सकते थे यही बात उनको राष्ट्रीय नायकों के समकक्ष देखने के लिए काफी है ।

गढ़वाली देश की अलग अलग जेलों जिसमे लखनऊ,बरेली, देहरादून,अलमोड़ा,डेरास्माइल सहित एटाबा बाद प्रमुख है ।26 सितम्बर 1941 को विभिन्न जेलों में सजा काटने के बाद उनकी रिहाई हुई। वीर चंद्र सिंह रिहाई के बाद आजादी के आंदोलन में कूद पड़े और पुनः गिरफ्तार कर लिए गए और तीन साल कैद में रहे । 1946 में रिहा होने पर उत्तराखंड के इस वीर ने 16 साल बाद घर वापसी की ।

संघर्ष जिसकी रगों में बसा हो वह भला हाथपर हाथ धरे कैसे बैठ सकता है गढ़वाली ने यहां भी टिहरी रियासत के खिलाफ आजादी का आंदोलन छेड़ दिया। उत्तराखंड के इतिहास में वीर चंद्र सिंह गढ़वाली का नाम स्वर्णाक्षरों में दर्ज है ।

हिलवार्ता का योद्धा को नमन ।


हिलवार्ता न्यूज डेस्क

@hillvarata. com