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 आज उत्तराखंड के लोकपर्वों में एक फूलदेई है यूं तो लोकपर्व रीति रिवाज संस्कृति के वाहक हैं लेकिन उसकी खूबसूरती और उसे मनाने की महत्ता तब और लगती है जब उस त्योहार को छोटे बच्चों की भागीदारी के साथ मनाया जाए फुलदेई इसी लिए अनूठा है कि बच्चे जो आगे चलकर संस्कृति के ध्वजवाहक होगे सीधे तौर पर इस पर्व में दखल रखते है । आइये एक कहानी से अपनी यादों को ताजा करें ।

  • दूर एक छोटा सा गांव, आंगन से धुवां उठ रहा है जैसे ही हम उस घर की तरफ बढ़ते हैं सामने परिवार के मुखिया ताऊ जी अंगीठी जलाने हाथ मे पाइप से फूंकते फूंकते खांसी कर रहे हैं  कि जल्द कोयले बनें और अंगीठी को अंदर सरका दें  शायद । बच्चे  बाग बकरी  खेल रहे हैं एक कोने में , छोटी छोटी छोटी लड़कियां भी अपना अलग गुट सा बना कोई प्लान बना रही हो । ताऊ जी की छोटी बहू जानवरों को चारा देने के बाद ठंड से बचने के लिए जानवरों के गोठ (गोशाला) गोबर से लीप रही हैं .पहाड़ों में दरवाजो के किनारों को अक्सर ठंड के दिनों बन्द किया जाता है , अभी काम चल ही रहा है कि अंदर से बुजुर्ग महिला( ताईजी) की आवाज आई कि बहु जल्दी करो आटा गूथ लिया है तुम्हारी नंनद ने ।
  • तभी बड़ी बहु ने आगे बढ़ चूल्हा सम्हाल लिया है ताऊ ताई अंगीठी के पास बैठ आग सेकने लगे हैं ताई यानी दादी ने सभी बच्चों बुलाया पास बैठने को कहा ,बच्चे दिन भर बाहर खेल थके हैं लेकिन उत्साहित । कल उनका त्योहार जो है आपस मे खुसफुसाहट सुबह जल्दी उठेंगे कोई किसी विशेष जगह लाने की कह रहा तभी दूसरा बच्चा किसी अन्य जगह जाने की , तभी दादी पास बुलाती है बैठने को कहती है , एक बच्चा दादी से कहानी सुनाने का आग्रह कर रहा वहीं दूसरे दादा जी से।
  • तभी दादा जी ने बाहर छोटी बहु को आवाज दी कि जल्दी करो बहु आजकल बाघ आ रहा शाम कल सामने वालों का कुत्ता उठा ले गया इतना सुनते ही बच्चे सब दादा दादी से चिपक दुबक गए हैं, बच्चे एक दूसरे को दरवाजे की तरफ बैठने से बच रहे हैं  बच्चों में डर और हंसी का अलग ही भाव दिखता है  ,
  • तभी चूल्हे से आवाज आई आओ बच्चों , पापा ,चाचा ,दादा जी संग खाना खाने खाना तैयार है , और जल्दी सब सोवो कल सुबह सब जल्दी उठेंगे कल क्या है पता है सब जोर से चिल्ला कहते है फुलदेही ।
  • खाना खाकर बच्चे, दिन भर के थके दौड़ बिस्तर के अंदर घुस गए हैं सुबह की फिर तैयारी की बातों बातों में शायद सो गए हैं ।
  • इधर ,ठंड बहुत है सास के संग बहुएं भी खाना खाकर जल्द आराम  चाहती है सुबह फिर ठंड में लकड़ी घास पानी की जदोजहद जानवरों के चारे का प्रबंध करना है और इसी व्यस्ता बीच पूरे उत्साह उमंग से अपना त्योहार भी मनाना है ,सुबह आंगन लीपना देहली (दहलीज) और ऐपन सभी तो करने हैं पता नहीं बच्चे कितनी सुबह आ जाएं ।पहाड़ों में साल भर काम ही काम हुआ ,जाड़े कठिनाई बढ़ा देते हैं खासकर बच्चों बुजुर्गों के लिए बुजुर्ग तो बात बात में कहते रहते , इस जाड़े काट ली ,अब आगे देखी जाएगी । मतलब कि पहाड़ की दिनचर्या कठिन वह भी जाड़ों में ज्यादा ही,
  • लेकिन समय परिवर्तनशील है देखते देखते  समय फरवरी का महीना आ गया है इस बीच त्योहारों की झड़ी लग जाती है बसन्त की शुरुवात यानी यह उत्साह का समय ।
  • कहते हैं ना परेशानी के बाद सुखद दिन भी आते हैं अब थोड़ा ठंड कम धूप की गर्मी से पहाड़ और वासिन्दों को राहत मिल गई है इधर उधर कोनों में पड़ी बर्फ पिघल गई है चिड़ियाएं आंगन ,पेड़ों पर चहकने लगी हैं, पेड़ पौधे से पुरानी पत्तियां गिर रही है साथ नई कोपलें, पत्तियां, हरियाली नई ऋतु के आगाज की गवाह बन रही हैं , आसपास खेतों,जंगलों में छोटे छोटे फूल खिलने लगे हैं जिसमे बुरांस फ्यूंली लाई के फूल सबसे अधिक आकर्षक हैं,गेहूं संग सरसों के पीले फूल यह बताने को तत्पर हैं कि भूल जाओ उन पूस की ठंडी रातों को अब बसंत का आगमन हो गया है । पांव में पड़ी गहरी दरारें जो तुसार में नंगे पांव चलने से पड़ी हैं हाथ पांव जो ठंड से फट गए थे सब ठीक हो जाएंगे बंसत की यह छटा मधुर धुन प्रकट करेगी,खुशियों के गीत गाकर जीवन को खुसी खुसी आगे बढ़ना है
  • बसन्त के आगमन की खुसी है बच्चे सब आसपास खेतों से जंगल से अपने बुजुर्गों को जो इन जगहों से फूल लेकर दिखाते हैं, देखो बाबा दादी में कैसे फूल लाई छोटे बच्चे जब टोकरियों में सुंदर फूल लेकर घर घर जाकर उत्साह दिखाएं हर तरह की परेशानी का छूमंतर हो जाना लाजिमी है । बुजुर्ग बच्चों के फूल देखकर ही आने वाले समय मे होने वाली फसल का अंदाज लगा लेते हैं आने वाली ऋतु फल फूल फसल के लिए कितना मुफीद है ।
    बच्चे खुसी खुसी अपने द्वारा लाये गए फूलों को हर घर मे जाकर बूढ़े बुजुर्गों दिखाते हैं उन्हें हर दहलीज में सजाते हैं, बच्चों को उत्साहित करने घर में उपलब्ध हर महत्पूर्ण खाने की चीज मीठा जिसमे गुड़ बतासा मिठाई ,चावल,पैसे बच्चों को देते हैं बच्चे घर घर जाते हुए गाते हैं….
  • फूल देई, छम्मा देई,देणी द्वार भर भकार,
  • यो देली पूजूँ बारम्बार बुजुर्गों कें
  • नमस्कार,फूल देई-छ्म्मा देई
  • देणी द्वार भर भकार ।
  • इसी तरह हर साल ,सदियों से मनाई जाती है फूल देहि । फूल देहि उतराखण्ड का लोक पर्व है अलग अलग लोगो इतिहास के विद्वानों द्वारा इस पर्व को मनाने के कारणों को बताया है । ….
  • #फूलदेई भारत के उत्तराखण्ड राज्य का एक स्थानीय त्यौहार है, जो चैत्र माह के आगमन पर मनाया जाता है। सम्पूर्ण उत्तराखंड में इस चैत्र महीने के प्रारम्भ होते ही अनेक पुष्प खिल जाते हैं, जिनमें फ्यूंली, लाई, ग्वीर्याल, किनगोड़, हिसर, बुराँस आदि प्रमुख हैं । चैत्र की पहली गते से छोटे-छोटे बच्चे हाथों में कैंणी (बारीक बांस की बनी टोकरी) लेकर प्रातः काल 4-5 बजे के लगभग अपने खेतों में या आँगन में जाकर फूलों को एकत्र करते हैं । अनन्तर सर्वप्रथम गाँव के मंदिर की देहली पर फूल श्रध्दा के साथ चढ़ाए जाते हैं । ततपश्चात अपने घरों की सभी देहलियों पर इन पुष्पों को चढ़ाया जाता है । ये बच्चे 8-9 दिनों तक इसी प्रकार पुष्प एकत्र करके चढ़ाते हैं । इस प्रकार फूलदेई उत्तराखंड का प्रसिद्ध त्यौहार है *।
  • इस पर्व को मनाए जाने के कारणों को समझने की दृष्टि से कहानी बनाकर आपके सामने रखा है जिससे आप भी अपने बचपन की यादों को पुनर्जीवित करे ।
    आप सभी को फुलदेई की बधाई ।
  • ओपी पांडेय
  • Hillvarta newsdesk
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