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कोविड 19 से प्रभावित उत्तराखंड के लगभग दो लाख 49 हजार 806 लोगों के सरकारी माध्यमों पर स्वयं को वापसी के लिए पंजीकृत कराया था। इधर अभी तक सरकारी आंकड़े के अनुसार एक लाख साठ हजार और 19 लोगों की घर वापसी हो गई है। इनमें से इनमें सबसे ज्यादा 58266 लोग दिल्ली से यूपी से 24902 हरियाणा से 23759, 9894 महाराष्ट्र से,9658 चंडीगढ़ से, 9439 पंजाब से, 8923 राजस्थान से, 7957 गुजरात से और 5770 कर्नाटका से है।

बड़ी संख्या में आ रहे लोगों के सामने रोजी रोटी की समस्या पैदा होगी बिगत 20 साल में पलायन आयोग के गठन के शिवा सरकारों द्वारा राज्य के युवाओं के लिए स्थानीय स्तर पर रोजगार के लिए कोई ठोस रोडमेप नही बन पाया है । ऐसे में बहस छिड़ना लाजमी है कि आखिर कैसे लोग अपना जीवन यापन करेंगे ।

उत्तराखंड में कई लोगों ने स्वरोजगार के जरिये बड़ा मुकाम हासिल किया है कई लोगों को रोजगार दिया है उनमें से एक नाम भीमताल निवासी संजीव भगत का है संजीव ने दैनिक समाचार पत्रों में नैनीताल मुख्यालय में वर्षों पत्रकारिता की है उसके बाद उन्होंने जो कदम उठाया वह एक मिसाल बन गया है । संजीव द्वारा स्थापित फ्रुटेज़ एक ब्रांड बन गया है ।उन्होंने अपने इर्द गिर्द हो रहे बदलावों को बखूबी देखा समझा है और एक जागरूक व्यवसायी होने की मिसाल पेश की है । उन्होंने अपने सोशल मीडिया अकाउंट पर रोजगार के अवसर को परिभाषित करने की कोशिश की है जिससे कि बाहर से आ रहे लोगों की समझ इस दिशा मे बढ़े । आइये उन्होंने कैसे अपनी बात रखी है पढ़ते है 👇

हमारे साथ कई नेपाली मजदूर जुड़े हैं। अब वे भी वापसी कर रहे हैं। उन्होंने कुछ दिन मेरे वहाँ भी काम किया । एक पिता-पुत्र से यूं ही हिसाब पूछ लिया तो उन्होने बताया कि दोनों पिछले छः महीने में मेहनत से अस्सी हजार रूपये बचाये हैं। कमाया कितना मालूम नहीं । जिसमें लाकडाउन का समय भी शामिल है। मतलब दोनों ने लगातार काम नहीं किया । हाँ इन्हें लाॅकडाउन में भी काम मिला।
ये दोनों ऐसे हैं जिनका काम और हिसाब मेरी निगाह में है मतलब कुछ छिपाया नहीं। दूसरा उदाहरण मेरे परिचित जौनपुर का ठेकेदार है 23 साल से यहीं रह रहा है इस लाकडाउन के बाद भी दो तीन महीनों में उसकेप्रत्येक मजदूर लगभग पच्चीस हजार कमा कर एक दो दिन पहले ही घर गये है। मैंने ठेकेदार से पूछा कि वो अपने गाँव नहीं जा रहा तो साफ बोला कि पहाड़ों की ठण्डी हवा को छोड़कर क्यो जाना ? ये ठेकेदार यहाँ परिवार सहित किराये में ही रहता है उसने बहुत साफ कहा कि अब गाँव से ज्यादा लोग तो मुझे यहाँ जानते हैं।अब वापसी की बात करें तो वैल्ड़िग करने वाला एक दुकानदार आज ही अपने घर बहेड़ी (यूपी) से काम करने के लिए अपने कारीगरों और परिवार सहित वापस लौट आया है ।उसे उम्मीद होगी की क्वारंटीन अवधि के बाद उसका काम धन्धा शुरू हो जायेगा।
इन सारे उदाहरणों में एक बात सूकून देने वाली है कि देवभूमि से कोई खाली हाथ और रोते बिलखते वापस नहीं जा रहा है।एक बात और वो खुशी खुशी काम पर वापस भी आयेगा।उत्तराखण्ड के संदर्भ और पलायन पर इन जैसे तमाम उदाहरणों पर चर्चा जरूर होनी चाहिए।तीनों उदाहरण उत्तराखण्ड से बाहर के लोगों के हैं जो बाहर से आकर यहाँ मजदूरी और छोटा मोटा काम करके अपनी आजीविका चला रहे हैं और इस कोरोना काल भी ज्यादा परेशान नहीं हैं।मैं इन उदाहरणों को सामने रखकर सिर्फ ये कहना
चाहता हूँ कि मेहनत और थोड़ा बहुत हुनर से उत्तराखण्ड के गाँव में भी आसानी से जिन्दगी का निबाह हो सकता है। बहुत कम पगार के लिए देश भर में भटकना बहुत समझदारी नहीं है।
पहाड़ के लोगों अपना हुनर भूल गये हैं और जो हुनरमंद यहाँ रह रहे है ,उनकी कमाई और इज्जत दोनो नहीं हो रही ।
गडबडी कहाँ है यही यक्ष प्रश्न है—-मेरी इस बात से अधिकांश लोग सहमत नहीं होंगे फिर भी इस बात को साझा का साहस कर रहा हूँ।

आपके आसपास भी इस तरह के रोजगार से जुड़े मामले है, जिनसे किसी प्रकार युवाओं को प्रोत्साहित किया जा सके तो हमें 9760038440 पर भेज दें और इस तरह की मुहिम में सहभागी बनें

हिलवार्ता न्यूज डेस्क