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भुप्पी पांडेय हत्याकांड के बाद आज डीआईजी कुमायूँ ने प्रेसवार्ता की है डीआईजी ने कहा है कि वह इस जघन्य कृत्य से दुखी है और इसमें अगर पुलिसकर्मियों की गलती पाई जाती है तो उन्हें बक्शा नहीं जाएगा उन्होंने कोतवाल सहित अन्य की भूमिका की जांच की बात की है । तमाम तरह से दबाव के बाद इस पूरे प्रकरण में घिरी पुलिस,अपने कर्मचारियों, अधिकारियों के खिलाफ जांच किस तरह आगे बढ़ाती है कि आगे ऐसे मामलों में उसका नाम न आये । यह जरूरी था कि कोई बड़ा अधिकारी आये और जनता के बीच पुलिस आपके लिये है का विश्वास दिलाये,इधर कई सवाल उठ रहे हैं कि क्या कोतवाल वाकई इस मामले में दोषी हैं ? अगर हैं तब माना जाता है कि लाइनहाजिर निलंबन देश काल परिस्थितियों के हिसाब चलता रहता है ,यह जानकार मानते हैं,देखना होगा कि केस में हीलाहवाली और मिलभगत के आरोपों से पुलिस अपना दामन जल्द इस कांड में से कैसे साफ कर पाती है

दीगर है कि नैनीताल जिले में सैकड़ों केस अभी अनसुलझे हैं ,उनका सलझना जनता देखेगी ,यहां खुद पुलिस के माथे यह नया बखेड़ा आ धमका । जैसी खुद कई अफसर मान रहे हैं कि इस मामले में जानबुझकर ढील दी गई, जिसके चलते ही अपराधियों के हौसले बुलंद थे कि सरेराह मुख्य चौराहे में यह घटना अंजाम दे दी गई ।

दरसल, जमीनों की खरीद फरोख्त और क्राइम का पुराना रिश्ता रहा है ,हल्द्वानी में विगत दिन हुआ जघन्य हत्याकांड इसका एक और उदाहरण कहा जा सकता है, जानकार बताते हैं कि अधिकतर मामलों में जमीन की सौदेबाजी करने वाले व्यक्ति को सरकार का या पुलिस का संरक्षण होता है तभी यह धंधा आपको रातों रात व्यारे न्यारे करा देता है , जमीन खरीद फरोख्त करने वाला व्यक्ति नेता, पुलिस दोनो की आड़ में ही मकान खाली कराना, विवादित जमीनों के मामलों को खुर्द बुर्द कराना,धमकाकर जमीन मकान खरीदने बेचने का धंधा करता है क्या यह सब ठीक हो सकता हैै।

सूत्र बताते हैं कि जमीन के धंधे में कई सफेदपोशों का पैसा लगा होता है जिसे वह थोड़ा बहुत आपराधिक प्रवृत्ति वाले व्यक्तियों के मार्फ़त लगाते हैं पर्दे के पीछे चलने वाले इस खेल मे सौदा दो व्यक्तियों में मध्य यानी क्रेता और विक्रेता के मध्य होता है तब आम लोगों को विवाद की जानकारी तभी हो पाती है जब भुप्पी पांडेय की तरह सरेआम हत्या हो जाती है । इस केस में भी ऐसा नहीं कि पुलिस अनभिज्ञ हो विवाद हमेशा पहले उसकी चौखट तक ही जाता है एक रिटायर्ड पुलिस अधिकारी ने बताया कि अधिकतर मामले पुलिस संजीदगी से रफा दफा करवा ही देती है कई लंबे जनःझट के चलते खुद ठीक हो ही जाते हैं किन्ही मामलों में इस तरह हो जाना पुलिस की नाकामयाबी तो कहना ही पड़ेगा,कभी कभी पुलिस का कोई अपना इंटरेस्ट ना हो यह कहना भी आसान नही । इसी सब की जांच होती है जो गुनहगार होगा उसे सजा मिलनी ही चाहिए ,वह मानते हैं डीआईजी साहब निसंदेह इस सबकी जाच करवाएंंगे ।

अगर इस केस की वाकई जड़ में जाना है तो इस पूरे प्रकरण को इस तरह समझना होगा कि यह खेल अकेले चंद लोगों का नही है,इसमें जमीन के सारे पुराने रिकार्ड खंगालने की जरूरत है, कहा क्या विवाद चल रहा है यह पुलिस के होमवर्क का हिस्सा होना चाहिए और होता है हर जगह हल्द्वानी सी स्थिति नही होती है तमाम दबावों के चलते भी अच्छे पुलिस अधिकारी संजीदगी से ऐसे केसों में ढिलाई नही देते। यह जरूरी जानना है कि क्या कारण रहे जब एक माह से दोनो के बीच विवाद की बात समाचार पत्रों तक मे सर्वजनिक हो गई थी पुलिस ने जायज एक्शन क्यों नहीं लिया गया शायद इससे काफी कुछ साल्व हो सकता था।

जमीन का धंधा और क्राइम को समझने के लिए लिए दो तीन तथ्यों पर ध्यान देने की जरूरत है कि इधर मंदी के चलते खरीद फरोख्त में कमी आई है खरीद फरोख्त नहीं हो रही यानी यह कारोबार घाटे में चल रहा है ,ऐसे में अगर कोई मामला लगातार आपके संज्ञान में आ रहा है तो अधिकारी को इसकी परख होनी चाहिए कि मामला गम्भीर हो सकता है यहां इस केस में जैसे दोनो पक्षों को इंतजार करवाया जा रहा था कि मंदी है जैसे भाई रुको अभी सब ठीक हो जाएगा ?

इसके एक दूसरे पहलू से भी इंकार नही किया जा सकता है ,एक्सपर्ट कहते हैं अगर आपका किसी केस में किसी तरह का कोई इंटरेस्ट है तभी आप किसी क्रिमनल एक्ट को हो जाने का समय देते हैं आप अपनी ड्यूटी नहीं कर रहे हैं आप अपने इंटरेस्ट को साध लिए जाने तक का इंतजार कर रहे हैं यही इस केस की जांच लाइन है ।

एक पुलिस के रिटायर्ड अफसर कहते हैं कि यह भी जानना आवश्यक है कि सामान्य से चूड़ी कारोबारीयों को पहले राजनीतिक संरक्षण किसने दिया , अपराधियों के पीछे किन राजनीतिक लोगों का हाथ है, आदि आदि यहां ज्ञात रहे कि दोनो को कुछ लोगो और राजनीतिक लोगो का बखूबी साथ मिला जब दोनो भाई पार्टी में भारी पड़ने लगे तब उन्हें बाहर कर दिया गया,कहा जा रहा है कि तब तक दोनो ने अपनी पैठ पुलिस प्रशासन तक बढ़ा ली । व्यस्ततम चौराहे पर दोनो भाइयों की दुकान का उद्घाटन हुआ जिसमें पुलिस के ईमानदार कहे जाने वाले सिपाही से लेकर अधिकारियों का इन आरोपी संग फोटो सेसन छप रहा है । लोगों का कहना है पुलिस की छवि को बचाने के लिए इस सब से पुलिसकर्मियों को ऐसे स्थानों समें जाने से बचना जाना चाहिए था।

इन्ही सब कारणों से एक अलग तरह का गठजोड़ आम लोगों को नजर आता है, और पुलिस पर भरोसा कम होता है,लोग चाहते हैं कि उच्चाधिकारियों को चाहिए कि हर किसी से बुके थाम लेना सोशल मीडिया में शेयर करने से साख पर बट्टा लगाने के लिए काफी है,सही और गलत को पहचानना आपकी पहली प्राथमिकता होनी चाहिए थी

पिछले दो तीन दिनों से तमाम माध्यमों से आम लोगों द्वारा यह सवाल उठना लाजिमी है कि आखिर पुलिस अधिकारी प्राथमिकी दर्ज होने के वावजूद कोई ठोस कदम क्यों नही उठा रहे थे, क्या उन पर कोई बाहरी दबाव था ?इसकी जांच की मांग भी उठने लगी है कि तमाम क्रिमनल चार्जेज के बाद भी उन्हें लाइसेंसी हथियार कैसे रखने दिया गया । पुलिस प्रशासन को शहर की फिजा को दुरुस्त रखने हेतु इस तरह के कारोबारियों पर पैनी नजर रखनी होगी, ब्याज पर ,कमेटियों के जरिये जमीनों की खरीद फरोख्त में लोगों का पैसा लगवा रहे हैं सूत्र कहते हैं कि बाजार क्षेत्र में कई लोगों का इन माध्यम से पैसा कारोबार में फसा है लालकुआं के एक ऐसे ही बड़े कारोबारी के रकम डूबने की बजह डिप्रेसन में जाना चर्चा का विषय बना है, ऐसे कई मामले आये दिन सुर्खियां बन रही है ,आने वाले समय मे इसकी गम्भीरता को समझ ,उचित कदम उठाए जाने की जरूरत है,जिससे ऐसे मामले रोके जा सकें,और आम आदमी की दहशत कम हो और सुरक्षा का भाव पैदा हो ।साथ ही शहर शान्तिपूर्ण व्यवहार करें। उम्मीद है कि डीआईजी द्वारा आज की गई बातों पर अमल होगा और लोग सुरक्षित महसूूस करेेंगे ।

हिलवार्ता न्यूज़ डेस्क

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