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उत्तराखंड मे उद्योगों, वाहनो,से दिनोदिन प्रदूषण बढ़ता ही जा रहा है प्रतिदिन घेरलू वेस्ट के साथ अस्पतालों का बायोमेडिकल वेस्ट भी जी का जंजाल बनता ही जा रहा है । पर्यावरण के प्रति राजनीतिक इच्छाशक्ति की कमी नगर निकायों, नगर निगमों के साथ-साथ जिला प्रशासन की उदासीनता के चलते समस्या साल-दर-साल बढ़ रही है, जिसका समय पर समाधान नहीं खोजा गया तो इसके गम्भीर परिणाम हो सकते हैं ।

हल्द्वानी देहरादून रुड़की उधमसिंह नगर सहित बड़ी आबादी क्षेत्र का भू जल,जमीन, हवा प्रदूषित हो चुकी हैं। प्रतिदिन इकट्ठा हो रहे कूड़े निस्तारण की कोई व्यवस्था इन स्थानों पर नही हो पा रही है ।इसके अलावा एक बड़ा गंभीर मसला  बायोमेडिकल वेस्ट का भी है सरकारी और निजी अस्पतालों का बायोमेडिकल वेस्ट को ठिकाने लगाने के लिए भी राज्य में उचित व्यवस्था की कमी है, अस्पतालों में डायग्नोस्टिक प्रक्रिया के उपयोग में आने वाली किसी भी प्रकार की सामग्री, संभावित संक्रामकों से दूषित होती है। इसमें मानव अंग, पशु अंग, माइक्रोबायोलाजी वेस्ट, वेस्ट शार्प, एक्सपायर दवाएं, साॅलिड वेस्ट, खून, घावसनी रुई, प्लास्टर, तरल वेस्ट, इंसिन्युरेटर वेस्ट और केमिकल वेस्ट शामिल होते हैं। बायोमेडिकल वेस्ट को खुलें में फेंकने पर ये हवा, जल और जमीन को प्रदूषित कर देता है, जिससे फेफडों में संक्रमण, परजीवी के संक्रमण, त्वचा के संक्रमण, एचआईवी, हेपेटाइटिस बी और सी जैसी वायरल बीमारियों का प्रसार, हैजा, ट्यूबरक्लोसिस आदि बीमारियों के होने की संभावना बढ़ जाती है। इसे काफी खतरनाक माना जाता है, इसलिए अस्पतालों से निकलने वाले वेस्ट के लिए रुड़की में जैव चिकित्सा अपशिष्ट निस्तारण केंद्र बनाया गया है और शासन ने बायोमेडिकल वेस्ट के ट्रीटमेंट के लिए रुड़की में ही मेडिकल पाल्यूशन कंट्रोल कमेटी (चिकित्सा प्रदूषण नियंत्रण समिति) को अधिकृत किया है। सभी अस्पतालों को प्रदूषण नियंत्रण बोर्ड से प्राधिकार लाइसेंस लेना भी अनिवार्य किया गया है, ताकि अस्पतालों का कूड़ा नियमित रूप से निस्तारण केंद्र तक पहुंचता रहे, लेकिन सरकार द्वारा तय यह व्यवस्था ऊंट के मुह जीरा सरीखे है।

अगर केवल देहरादून के 220 अस्पतालों की ही बात करें तो माजरा समझने में देर नही लगेगी देहरादून 220 अस्पतालों में से 97 ने प्राधिकार लाइसेंस ही नहीं लिया है, जिनमें 45 अस्पताल शहर के बीचो बीच हैं। ये अस्पताल बायोमेडिकल वेस्ट को नगर निगम के कूड़ेदान या जहां तहां, डाल रहे हैं। नगर निगम को बोयोमेडिकल वेस्ट को उठाने के लिए मना किया गया है,बावजूद इसके सामान्य कूड़े में अस्पतालों के वेस्ट हर जगह देखा जा सकता है.पर्यावरण की समझ रखने वाले डॉ हरीश अंडोला कहते हैं कि बायोमेडिकल वेस्ट का निस्तारण पर्यावरण संरक्षण अधिनियम 1986 के प्रावधानों के अंतर्गत किया जाता है। नियमों का उल्लंघन करने पर अधिनियम के सेक्शन 15 के तहत पांच साल तक की जेल, एक लाख तक का जुर्माना या दोनों हो सकते हैं। सेक्शन पांच में अस्पतालो का बिजली का कनेक्शन काटने और सीलिंग की कार्रवाई की जा सकती है। इसके अलावा बायोमेडिकल वेस्ट के लिए कूड़ादान भी अलग-अलग रंग के होने चाहिए। जिसमें लाल रंग का कूड़ादान माइक्रोबायोलाजी, सायल्ड और साॅलिड वेस्ट के लिए, पीला कूड़ादान मानव अंग, पशु अंग, माइक्रोबायोलाजी, सायल्ड वेस्ट, नीला व सफेद कूड़ादान वेस्ट शार्प और सालिड वेस्ट तथा काला कूड़ादान एक्सपायरी दवाएं, इंसिन्युरेटर एश, केमिकल वेस्ट के लिए होना चाहिए। इसके बाद निस्तारण के लिए कूड़े को दस श्रेणियों मे बांटा जाता है, कुछ अस्पतालों को छोड़ ये डब्बे दिखाने के लिए ही रखे गए हैं क्या कारण है कि रोज कहीं न कहीं मेडिकल वेस्ट का सामान्य वेस्ट संग मिलने की शिकायत आम बात है।

आंकड़ों पर नजर डालें तो देहरादून नगर निगम क्षेत्र में रोजाना लगभग 3 सौ मीट्रिक टन कूड़ा एकत्र होता है। इसमें 2300 किलो बायोमेडिकल वेस्ट होता है, जिसमें से 1228 किलो कूड़ा ही उठता है, जो कि ज्यादातर सरकारी अस्पतालों का है। शेष बचा कूड़ा निजी अस्पतालों, नर्सिंग होम, क्लीनिक आदि जहां-तहां खुले में फेंक दिया जाता है साफ है । कार्यदायी संस्थाओं की बेरुखी साफ दिखती है, कुल मिलाकर प्रदेश की राजधानी सहित बड़े शहरों की सेहत बिगड़ रही है। पर्यावरण संरक्षण के 1986 के प्रावधानों के अंतर्गत मेडिकल वेस्ट का निस्तारण किया जाना सुनिश्चित होता है इसके नियमों का उल्लंघन करने पर अधिनियम के सेक्शन 15 के तहत पांच साल तक की जेल, एक लाख तक का जुर्माना या दोनों हो सकते हैं। सेक्शन पांच में अस्पतालो का बिजली का कनेक्शन काटने और सीलिंग की कार्रवाई की जा सकती है। उत्तराखंड को पर्यटन प्रदेश के रूप में विकसित करने की कवायद का यहां के पर्यावरण का सीधा संबंध है जिसे दुरुस्त किया जाना आम लोगों और प्रदेश के स्वास्थ्य के लिए अति आवश्यक है ।

डॉ हरीश चन्द्र अंडोला

@हिलवार्ता न्यूज डेस्क