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उत्तराखंड में कर्मचारियों अधिकारियों का स्थानांतरण एक बड़ा मुद्दा रहा है इसका कारण राज्य की भौगोलिक संरचना है देहरादून ऊधमसिंह नगर हरिद्वार और नैनीताल का अधिकांश हिस्सा मैदानी भाग है वहीं शेष बचा हिस्सा पर्वतीय ।
राज्य गठन से ही पहाड़ पर कर्मचारियों की कमी है वहाँ सुविधाओं के अभाव में कर्मचारी जाना ही नहीं चाहते यही कारण है कि सरकारों को लम्बी जदोजहद बाद स्थानांतरण पॉलिसी लानी पड़ी, जिससे कि लोकसेवकों के साथ न्याय हो सके । इसके बावजूद नियमों में झोल दिखाई पड़ता है, अलग अलग समय पर अपनी ऊंची पहुच के हिसाब से अधिकारी कर्मचारी इसका फायदा अपने पक्ष में लेते रहे हैं, जिसके लंबे हाथ वह अटैच हुआ जाता है,कतिपय विभागीय अधिकारी या कर्मचारी अपनी सुविधानुसार जुगाड़ लगा अपनी पसंदीदा जगह पा लेते हैं उन निरीह लोकसेवकों का खयाल ही ट्रांसफर एक्ट में सुझाया गया कि उनको भी मौका मिले जो वर्षों से सुदूर से सुगम में कभी आ ही नहीं पाए ।
शिक्षा विभाग ने हालिया हाईकोर्ट के निर्णय के बाद एक आदेश जारी किया है जिसमें जनहित याचिका के संसोधित निर्णय का हवाला दिया गया है कि अनिवार्य स्थानांतरण के इतर मैदानी छेत्रों के प्रधानाचार्यों के अनुरोध पर स्थानांतरण पर पर विकल्प नहीं भरने की बात कही गई है जबकि कोर्ट के आदेश में इस बात का कहीं जिक्र नहीं किया गया है.
यहां यह बात ध्यान देने वाली है हाई कोर्ट नैनीताल ने जनहित याचिका संख्या 164 /2013 के संदर्भ में 18 जून 2018 के निर्णय का 10 मई 2019 को संशोधित आदेश दिया है जबकि शिक्षा विभाग द्वारा प्रेषित लिस्ट के अंत मे कोर्ट का हवाला देकर कहा गया है कि इन चार जिलों के प्रधानाचार्य भी अनुरोध का विकल्प नहीं भर सकेंगे । आदेश को पढ़कर समझ आता है कि कोर्ट द्वारा आदेश में कहीं नहीं कहा गया है कि दुर्गम से या पर्वतीय छेत्र से कोई भी उक्त चारों जिलों के लिए विकल्प नहीं भर सकेगा इन चारों जिलों से दुर्गम के लिए कोई भी विकल्प भर सकता है। अर्थात ऊधम सिंह नगर, हरिद्वार, देहरादून व नैनीताल मैदानी क्षेत्रों से दुर्गम में जाने पर सहायक अध्यापक,प्रवक्ता, लिपिक संवर्ग विकल्प भर सकते हैं, केवल गंभीर बीमारी की स्तिथि में धारा 27 के तहत उक्त छूट पा सकते हैं
दरसल उत्तराखंड लोकसेवक वार्षिक स्थानांतरण एक्ट 2017 की धारा 17 (2)(क) के अनुसार समूह क और ख के अधिकारी उनके गृह जनपद में तैनात नहीं किये जायेंगे, प्रधानाचार्यों के अनिवार्य स्थानान्तरण के अंतर्गत दुर्गम से सुगम छेत्र में स्थानांतरण हेतु पात्र प्रधानाचार्यों की सूची के अंत मे लगा नोट ही इस मामले में प्रधानाचार्यों के गले नहीं उतर रही है उनका कहना है कि आदेश सालों से पर्वतीय छेत्रों में कार्यरत प्रधानाचार्यो की इन चार जिलों में स्थानांतरण की संभावना समाप्त कर रहा है. ।
हिलवार्ता से बातचीत में कुछ प्रधानाचार्य इसे कोर्ट के आदेश के उल्लंघन के रूप में देखते हैं वहीं कुछ इसमें गड़बड़ी का अंदेशा जताते हुए कहते हैं विभाग की यह पॉलिसी कई वर्षों से दुर्गम से सुगम की आशा में बैठे अधिकारियों के साथ जानबूझ अन्याय है,बहरहाल शिक्षा विभाग का यह फरमान चर्चाओं में आ गया है कि आखिर इस सब के पीछे विभाग की मंशा के क्या मायने है
हिलवार्ता न्यूज डेस्क
@ hillvarta. com