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नैनीताल में एक शताब्दी से बिजली जगमगा रही है आज से ठीक 100 साल पहले प्रसिद्ध पर्यटक स्थल में बिजली का आगमन यानी पहली बार बल्ब से रोशनी की गई । नैनीताल से वरिष्ठ पत्रकार / लेखक की विशेष रिपोर्ट हिलवार्ता के माध्यम  से हम प्रस्तुत कर रहे हैं । 

नैनीताल में बिजली की जगमगाहट को एक सौ साल पूरे हो गए हैं। बीसवीं शताब्दी के प्रारंभिक दशकों में जब भारत में कोलकाता, दिल्ली, बंगलुरू आदि चंद महानगरों और मसूरी जैसे विरले हिल स्टेशनों को छोड़ बाकी ज्यादातर जगहों के घरों और सड़कों में मिट्टी के तेल के लैंप जला करते थे, तब नैनीताल जैसा छोटे-सा पर्वतीय नगर खुद की बनाई बिजली की रोशनी में जगमगाने लगा था।

नैनीताल की झील, पहाड़ियों की दिलकश दृश्यावली,अप्रतिम कुदरती सौंदर्य, मौसम और आबोहवा ने अंग्रेजों का मन मोहा। अंग्रेजों को नैनीताल के रूप में एशिया में यूरोप नज़र आया। उन्होंने नैनीताल को “कंट्री रिट्रीट” यानी ‘उच्च वर्ग के लिए शांत और एकांत’ नगर के रूप में बसाया और विकसित किया।ब्रिटिश शासकों ने महज एक नीति-निर्धारक एवं नियामक की भूमिका में रहते हुए बिना किसी भारी-भरकम बजट के एक वीरान जंगल को उस वक्त के संसार के सर्वोत्तम, स्वास्थ्यवर्धक एवं आदर्श नगर में तबदील कर दिया था।1922 में पानी से बिजली उत्पादित कर नैनीताल का रौशन हो जाना अंग्रेजों के प्रयासों का ही सुफल था।

अपनी बसावट के चंद दशकों के भीतर साफ- सफाई व्यवस्था और शुद्ध पेयजल आपूर्ति सहित अन्य नगरीय सेवाओं के मामले में नैनीताल, इंग्लैंड के कई विकसित शहरों से भी आगे निकल गया था।24 अक्टूबर,1884 को काठगोदाम तक रेल पहुँच गई थी। लेकिन नॉर्थ वेस्टर्न प्रोविंसेज का एक महत्वपूर्ण नगर होने के बावजूद यहाँ नैनीताल में बिजली व्यवस्था नहीं होने को लेकर यहाँ के बाशिंदों में जबरदस्त नाराजगी थी। 1890 में यहाँ ‘नैनीताल प्रोपराइटर्स एसोसिएशन’ बनी।इस एसोसिएशन में अवकाश प्राप्त उच्च अधिकारी और समाज के विभिन्न क्षेत्रों में दक्षता रखने वाले वरिष्ठ नागरिक सम्मिलित थे।इस एसोसिएशन ने सबसे पहले नैनीताल में पन बिजली संयंत्र लगा कर यहाँ विद्युत आपूर्ति व्यवस्था कायम करने की माँग उठाई थी।

10 नवंबर,1890 को नैनीताल प्रोपराइटर्स एसोसिएशन के अध्यक्ष फ्लीडवुड विलियम्स ने नॉर्थ वेस्टर्न प्रोविंसेज एंड अवध के सचिव को पत्र भेजकर बलियानाले में उपलब्ध पानी का उपयोग बिजली उत्पादन के लिए किए जाने का सुझाव दिया। नॉर्थ वेस्टर्न प्रोविंसेज एंड अवध के पीडब्ल्यूडी सचिव जे.जी.एच. ग्लास ने 7 जुलाई,1893 को प्रोविंसेज के लेफ्टिनेंट गवर्नर को भेजी गई एक विस्तृत रिपोर्ट में पुनः नैनीताल में पन बिजली संयंत्र लगाने की सिफारिश की। इसी साल नैनीताल के निकट बेलुवाखान नामक गाँव में बिजली स्टेशन बनाने का प्रस्ताव बना। लेकिन बात आगे नहीं बढ़ी। इसके बाद यह मुद्दा अनजान वजहों से ठंडे बस्ते में चला गया।

1912 में नगर पालिका में फिर से नैनीताल में जल विद्युत योजना बनाने का प्रस्ताव आया।इसी साल नगर पालिका ने बलियानाले में जा रहे नैनी झील के अतिरिक्त पानी का सदुपयोग कर जल विद्युत योजना स्थापित करने का शुरुआती प्रारूप बनाकर सरकार को भेजा दिया।

1913 में नैनीताल में जल विद्युत योजना को लेकर भारत सरकार ने बिजली इंस्पेक्टर से रिपोर्ट माँगी। बिजली इंस्पेक्टर ने उसी साल इस संबंध में अपनी रिपोर्ट भारत सरकार को सौंप दी थी। रिपोर्ट में प्रस्तावित पन बिजली योजना की लागत 1,88,000 रुपये आँकी गई थी।

1914 में प्रथम विश्व युद्ध प्रारंभ हो गया।विश्व युद्ध की वजह से जल विद्युत परियोजना का काम अधर में लटक गया। चूँकि जल विद्युत परियोजना के लिए यूरोप से मशीनें आनी थीं। युद्ध के चलते यह संभव नहीं था। लिहाजा युद्ध की समाप्ति तक इस योजना को दाखिल दफ्तर कर दिया गया।

1919 में प्रथम विश्व युद्ध समाप्त हो गया।इसके फौरन बाद जल विद्युत परियोजना के बारे में पुनः विचार किया जाने लगा। चूंकि नैनीताल में अब सिर्फ रोशनी के लिए ही नहीं, बल्कि पीने के पानी पंपों को चलाने के लिए भी जल विद्युत परियोजना को हक़ीक़ी बनाना लाजिमी हो गया था। इसके लिए मसूरी नगर पालिका से सहायता ली गई। मसूरी नगर पालिका के विद्युत इंजीनियर मिस्टर बेल और ‘मैसर्स मैंथर एंड प्लैट’ के प्रतिनिधियों के अध्ययन के उपरांत तैयार रिपोर्ट के आधार पर यूनाइटेड प्रोविंसेज के स्वास्थ्य विभाग ने 1919 नैनीताल विद्युत एवं पेयजल आपूर्ति योजना का 11,19,429 रुपये का आगणन तैयार किया था। लेकिन मजदूरी एवं उपकरणों की बढ़ती कीमतों की वजह से यह धनराशि 20,72,383 रुपये तक जा पहुँची थी।

अंततः नैनीताल की जल विद्युत परियोजना को मंजूरी मिल गई। 1920 में इस जल विद्युत परियोजना का काम प्रारंभ हुआ।इस पावर हाउस की ज्यादातर मशीनें यूरोप से मंगवाई गईं। नगर पालिका ने 1 सितंबर,1921 को बिजली वितरण का लाइसेंस प्राप्त करने के लिए सरकार को अनुरोध पत्र भेजा। इसके साथ ही नगर पालिका ने सरकारी और निजी भवनों में आंतरिक और वाह्य बिजली की वायरिंग के लिए निविदाएं आमंत्रित की।इस कार्य के लिए नगर पालिका ने ‘मैसर्स- मेट्रोपोलिटन वर्क्स लिमिटेड’ की निविदा स्वीकार कर ली।कुछ दिनों के बाद इस कंपनी ने नैनीताल में अपना शो-रूम भी खोल लिया।तब नैनीताल में अवस्थित 41 सरकारी कार्यालयों/गैर सरकारी कार्यालयों और नगर के संपूर्ण निजी बंगलों और घरों में बिजली के तारों की फिटिंग नगर पालिका ने खुद कराई।इस कार्य के लिए नगर पालिका ने सरकार से सात फ़ीसद ब्याज दर पर सत्तर हजार रुपये का कर्ज माँगा, सरकार ने नहीं दिया। फिर भी नगर पालिका ने हार नहीं मानी। अपनी प्रबल इच्छाशक्ति और सामर्थ्य के बूते यह कार्य कर दिखलाया।

बहुत कम वक्त में नगर पालिका ने दुर्गापुर पावर हाउस का निर्माण कार्य सम्पन्न करा दिया था।पावर हाउस में विद्युत उत्पादन के सभी संयंत्र स्थापित कर दिए गए। नवंबर,1921 में झील के निचले हिस्से यानी तल्लीताल के कुछ क्षेत्रों में बिजली के बल्ब जगमगाने लगे थे। 1 सितंबर,1922 को संपूर्ण नैनीताल में बिजली की नियमित आपूर्ति प्रारंभ हो गई थी। नतीजतन समूचा नैनीताल नगर बिजली की रोशनी में जगमगाने लगा था। इस विद्युत परियोजना में कुलमिलाकर करीब बाइस लाख रुपये खर्च हुए थे।

इस बिजली योजना के संचालन का जिम्मा नगर पालिका के सार्वजनिक स्वास्थ्य विभाग के पास था। शुरू में बिजली की दर तीन आना प्रति यूनिट तय की गई थी। पहले साल बिजली आपूर्ति में नगर पालिका को 22,251 का नुकसान उठाना पड़ा था। नुकसान के मद्देनजर सुझाव आया कि नगर पालिका बिजली आपूर्ति के काम को किसी निजी कंपनी को ठेके पर दे दे। लेकिन नगर पालिका ने ऐसा करने से साफ इंकार कर दिया। नगर पालिका का कहना था कि बिजली की इस योजना से पालिका के व्यावसायिक हित नहीं जुड़े हैं। नगर पालिका को इस बात की तसल्ली थी कि नैनीताल खुद की बनाई बिजली से रौशन हो गया है। नगर की जलापूर्ति से जुड़े पानी के पंपों को भी कालांतर में बिजली संयोजन से जोड़ दिया गया।

30 नवंबर,1975 से 21 जनवरी,1976 तक उत्तर प्रदेश में राष्ट्रपति शासन रहा। इस दौरान डॉक्टर एम. चन्ना रेड्डी उत्तर प्रदेश के राज्यपाल थे। उनके शासनकाल में दुर्गापुर पावर हाउस समेत संपूर्ण विद्युत व्यवस्था और इससे जुड़ी सभी परिसंपत्तियां नगर पालिका से छीनकर विद्युत विभाग के हवाले कर दीं गईं।

विद्युत विभाग के हवाले होने के फौरन बाद से ही दुर्गापुर पावर हाउस के दुर्दिनों की शुरुआत हो गई। विद्युत विभाग ने कुछ वर्षों तक इस जल विद्युत परियोजना का सुचारू संचालन किया।कालांतर में इस पावर हाउस की उपेक्षा शुरू हो गई।अंततः यह इकाई बंद कर दी गई। यहाँ स्थापित मशीनें एवं अन्य उपकरण जंग खाने लगे।2008-09 में खंडहर में तबदील हो चुके दुर्गापुर के इस पावर हाउस में जे.एन.एन.यू.आर.एम.योजना के अंतर्गत 930 लाख रुपये की लागत से करीब दो सौ घर बना दिए गए हैं। इसके साथ ही नैनीताल के अतीत से जुड़ा एक यादगार संस्थान का वजूद भी ख़त्म हो गया है।

हिलवार्ता न्यूज डेस्क 

 

 

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