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( World Envionment day 2022)

आज पूरा विश्व पर्यावरण दिवस मना रहा है । मानव जीवन प्राकृतिक संसाधनों पर निर्भर है । जनसंख्या लगातार बढ़ रही है । बढ़ती जनसंख्या की वजह संसाधनों पर बोझ पड़ रहा है । विगत 100 साल के इतिहास पर नजर डालने पर ज्ञात होता है कि जल जंगल जमीन तीनो कम हो रहे हैं । भारत की बात करें तो कई महानगरों में भू जल समाप्ति की कगार पर है अत्यधिक शहरीकरण की वजह जहां एक ओर जल और जमीन का संकट है वहीं जंगल भी कम हो रहे हैं । जंगलों से जैव विविधता खत्म हो रही है जिसकी वजह साफ सुथरी हवा मिलना आसान नही है । औद्योगिकीकरण की वजह और भारी यातायात के कारण शहरों से निकलता प्रदूषण आमजन की प्राण वायु के लिए खतरा बनकर उभरा है । प्लास्टिक अपशिष्ट सहित दैनिक कचरा जहां जमीनों की उर्वरा शक्ति को समाप्त कर रहा है वहीं प्रदूषित जमीनों पर उगाया जा रहा फल शब्जी अनाज बीमारी की वजह बन रही है । नई पीढ़ी को स्वच्छ और स्वस्थ्य वातावरण प्रदान करना हम सबका कर्तब्य है लेकिन विश्विकरण के दौर में सब कुछ भूल हम किसी भी कीमत पर प्राकृतिक संसाधनों का दोहन कर ही रहे हैं साथ ही नई जेनरेशन के लिए समस्या खड़ी कर रहे हैं । नदियों को गंदा करना , पेड़ों का कटान,और किसी न किसी रूप में पर्यावरण को नुकसान पहुचा हम मानवजाति के अस्तित्व के लिए स्वयं खतरा पैदा कर रहे हैं । इन्ही सब चिंताओं के मद्देनजर world Enviroment day मनाया जाता है लेकिन यह सवाल इस दिवस के मनाए जाने के दिन से ही बना हुआ है कि क्या वाकई हम एक दिन पर्यावरण दिवस मना लेने से इस समस्या से निवर्त हो सकेंगे ?

शायद इस यक्ष प्रश्न का उत्तर किसी के पास नहीं है ।वावजूद इसके कि पर्यावरण को बचाने की जदोजहद के लिए हम 1974 से लगातार लोगों को आगाह प्रशिक्षित और पर्यावरण संरक्षण हेतु सजग कर रहे हैं ।

नैनीताल निवासी वरिष्ठ पत्रकार प्रयाग पांडे द्वारा उत्तराखंड के परिपेक्ष्य में एक विस्तृत रिपोर्ट तैयार की गई है । चूंकि उत्तराखंड देश का सर्वाधिक वनाच्छादित क्षेत्र है हम देश की प्राणवायु का एक बड़ा हिस्सा प्रोड्यूस करने वाले प्रदेश रहे हैं हमारे राज्य के कुल क्षेत्रफल का लगभग 45 प्रतिशत भूभाग वन बहुल है ।

लेकिन जिस तरह लगातार वनों आग और नदियों में प्रदूषण फैल रहा है यह चिंताजनक है बेकाबू आबादी और पर्यटन जहां नदियों के लिए संकट पैदा कर रहे हैं वहीं आग हर साल कई हेक्टेयर जंगलों की जैव विविधता को लील जा रही है पलायन की वजह वनों के प्रति बेरुखी बढ़ी है यह भी चिंताजनक है । लेखक ने इन्ही सब बातों को आंकड़ों के जरिये सामने रखा है । जिसे हम हिलवार्ता के माध्यम से आप तक पहुचा रहे हैं ..

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जैव विविधता का संरक्षक बांज खतरे में

जीवन को कायम रखने के लिए भोजन, ऑक्सीजन और पानी के साथ जैव विविधता का होना आवश्यक समझा जाता है। पारिस्थितिक तंत्र के स्थायित्व के लिए भी जैव विविधता जरूरी है। पहाड़ के जंगल जैव विविधता के भंडार कहे जाते हैं। उत्तराखंड के जंगलों में जैव विविधता के नाजुक संतुलन को कायम रखने के लिए ‘बांज’ प्रजाति के पेड़ों की महत्वपूर्ण भूमिका है। बांज को पहाड़ का कल्प वृक्ष कहा जाता है।लेकिन ‘बाना’ नामक एक परजीवी ने बांज के वृक्षों पर हमला बोल दिया है। बाना के बढ़ते प्रकोप से पहाड़ के जंगलों की जैव विविधता और खूबसूरती, दोनों खतरे में पड़ गए हैं।यह परजीवी जिनसे ऊर्जा और पोषण प्राप्त कर पल और बढ़ रहा है, उसी आश्रयदाता बांज प्रजाति के वृक्षों के सर्वनाश का कारण बनता जा रहा है।

यूँ तो वन संपूर्ण मनुष्य जाति की जीवन पद्धति और संस्कृति का महत्वपूर्ण हिस्सा रहे हैं।लेकिन पहाड़ का समूचा जीवन चक्र वनों से प्राप्त ऊर्जा से ही चलता है।पहाड़ के ग्रामीण क्षेत्रों की अर्थव्यवस्था मुख्य रूप से जंगलों पर ही निर्भर रही है। उत्तराखंड वन बाहुल्य राज्य है।यहाँ के कुल भौगोलिक क्षेत्रफल 53483 वर्ग किलोमीटर में से तकरीबन 38000 वर्ग किलोमीटर यानी करीब 71 फ़ीसद वन क्षेत्र है।राज्य के कुल भौगोलिक क्षेत्रफल के सापेक्ष तकरीबन 46.73 प्रतिशत वनाच्छादित क्षेत्र है। इसमें से 383088.12 हैक्टेयर यानी करीब 15.69 प्रतिशत क्षेत्र में बांज के वन फैले हैं।

उत्तराखंड में बांज के अलावा साल, शीशम, देवदार, भोजपत्र, भीमल, मेहल, खडिक, च्यूरा, पाईयां और चीड़ के जंगल हैं। इन सबमें बांज सबसे उपयोगी और महत्वपूर्ण है। समुद्र सतह से नौ सौ मीटर ऊँचाई से ढाई हजार मीटर ऊँचाई तक स्थानीय आबोहवा के मुताबिक यहाँ बांज की छह प्रजातियां पाई जाती हैं, जिन्हें बांज, फलियांट या फनियांट बांज, रियांज बांज, तिलौंज, मणिपुरी और खरासूं बांज के नाम से जाना जाता है। बांज के वृक्ष की अधिकतम ऊँचाई एक सौ फिट और गोलाई करीब पंद्रह फिट तक होती है। एक बांज के पेड़ को विकसित होने में कई वर्ष लग जाते हैं।

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बांज बहुउपयोगी और सदाबहार चौड़ी पत्ती वाला वृक्ष है। इसके पेड़ साल भर हरे-भरे रहते हैं। पारिस्थितिक और पर्यावरण की दृष्टि से बांज को उत्तराखंड के जंगलों के लिए कुदरत का अनमोल उपहार माना जाता है। पर्यावरण संतुलन कायम रखने में बांज के वृक्षों का महत्वपूर्ण योगदान है।इसके पेड़ों का घनत्व और फैलाव विस्तृत होता है। बांज के पेड़ों की जड़ें लंबी और दूर तक फैली होती हैं।

बांज के जंगलों में दूसरी प्रजाति के पेड़ों के जंगलों के मुकाबले ज्यादा वर्षा होती है। बांज का पेड़ पानी की गति को नियंत्रित कर मिट्टी के कटाव को रोकता है। बांज के पेड़ों में बरसात का पानी सोख कर नदियों और जल स्रोतों को साल भर पानी देने की अदभुत क्षमता होती है। भूमिगत जलाशयों के पुनर्भरण में बांज महत्वपूर्ण भूमिका निभाता है। इसके जंगल बरसात के पानी को संचित करने में अहम योगदान देते हैं। यही वजह है कि बांज के जंगल में सदैव नमी बरकरार रहती है। बांज के जंगल का पानी हरेक मौसम में ठंडा और मीठा होता है।

बांज ग्रामीण क्षेत्रों के रोजमर्रा के जीवन चक्र से गहराई से जुड़ा है।सदाबहार वृक्ष होने के कारण बांज की हरी पत्तियों से पशुओं को साल भर पौष्टिक चारा मिलता है। बांज की मजबूत और टिकाऊ लकड़ी से खेती-किसानी के काम में आने वाले औजार बनाए जाते हैं।इसकी लकड़ी का जलावन के रूप में सबसे अधिक उपयोग होता है। बांज में तीव्र ताप शक्ति होती है। बांज की पत्तियों से बनी खाद भूमि की उर्वरा शक्ति को बढ़ाती है।

उत्तराखंड के जंगलों में जैव विविधता बनाए रखने में बांज को प्रमुख कारक माना जाता है।बांज के जंगल का अपना पारिस्थितिक तंत्र होता है, जिसमें अनेक प्रकार की झाड़ियां, बांस और दूसरी शाकीय प्रजाति की सैकड़ों वनस्पतियां पनाह पाती हैं। पारिस्थितिक तंत्र के लिए आवश्यक दूसरी प्रजातियों के फलने- फूलने में बांज महत्वपूर्ण भूमिका निभाता है। बांज ऑक्सीजन का खजाना है। लेकिन बाना नाम का एक परजीवी बांज की इस महत्वपूर्ण प्रजाति की जान का दुश्मन बन गया है। बाना, बांज के पेड़ों की भोजन नलिका में अपनी जड़ें डालकर बांज के सभी पोषक तत्वों को खुद हजम कर जाता है।समय के साथ इस परजीवी का विस्तार होते रहता है और आश्रयदाता बांज के पेड़ अल्पायु में सूखने लगते हैं। इस परजीवी में छोटे-छोटे मीठे बीज लगते हैं। इन बीजों को चिड़िया, लंगूर और बंदर खाते हैं। इन्हीं के द्वारा बाना का निरंतर विस्तार होता रहता है। बाना का प्रकोप घने जंगलों के मुकाबले मानवीय हस्तक्षेप वाले क्षेत्रों में अधिक है। आबादी वाले इलाकों में जहाँ बांज की शाखाएं काटी जाती हैं, उन्हीं क्षेत्रों में बाना अधिक पनपता है। बांज के पेड़ की जिस शाख में बाना लग जाए,उसे काटकर जला देना ही इसका एकमात्र उपाय है। ताकि पेड़ के दूसरे हिस्सों को इसके कहर से बचाया जा सके।

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बांज के पेड़ों में बाना के रूप में मंडरा रहा यह खतरा प्राकृतिक कम, मावन जनित अधिक है। उत्तराखंड के जंगलों में दूसरी उपयोगी प्रजातियों के मुकाबले बांज के जंगल अधिक हैं। बहुउपयोगी होने के कारण पहाड़ में सबसे ज्यादा दोहन बांज का ही होता है। अति दोहन के चलते बांज के जंगलों का पारिस्थितिक तंत्र बदल रहा है। जानकारों का मानना है कि बाना उन क्षेत्रों में अधिक फैल रहा है, जहाँ बांज के साथ स्वाभाविक रूप से उगने वाली सैकड़ों प्रजाति की वनस्पतियों में से अधिकांश लुप्त हो गई हैं। इन प्रजातियों के लुप्त होने से बांज की स्वाभाविक प्रतिरोधक क्षमता घट गई है।नैनीताल इस बात का उदाहरण है। नैनीताल नगर में दूसरी प्रजातियों के बनिस्बत बांज के वृक्ष अधिक हैं। यहाँ मौजूद बांज के अधिकांश वृक्ष बाना के जानलेवा जाल की गिरफ्त में नजर आते हैं। कुछ वर्ष पूर्व वन विभाग ने नैनीताल नगर में बाना से प्रभावित बांज के पेड़ों की शाखाओं को काटकर जलाने का अभियान भी चलाया। पर सब बेकार।
बाना ने दूसरे तंदुरुस्त पेड़ों को अपनी गिरफ्त में ले लिया।

इधर कुछ दशकों से पहाड़ के जंगलों के ऊपर मानव दबाव बढ़ा है। इससे पर्यावरण से जुड़ी समस्याएं भी पैदा होने लगी हैं। जनसंख्या वृद्धि एवं अनियंत्रित और अनियोजित विकास ने यहाँ के लचीले एवं भंगुर पर्यावरण के जटिल तंत्र को क्षति पहुँचाई है।परिणामस्वरूप यहाँ भू- स्खलन, भूमि विनाश, जल प्रदूषण, वायु प्रदूषण और पीने के पानी का संकट जैसी समस्याएं उत्पन्न हो गई हैं। उत्तराखंड में शक्ति और सत्ता के बदलते समीकरणों ने पारिस्थितिक और पर्यावरणीय मुद्दों को हासिए में धकेल दिया है। सरकारें यहाँ के जंगलों के प्रति संवेदनशील और सचेत नहीं दिखतीं। ऐसी स्थिति में बाना के फैलते जाल से बांज को बचा पाना एक बड़ी चुनौती है।

हिलवार्ता न्यूज डेस्क 

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