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उत्तराखंड से राज्य सभा सांसद प्रदीप टम्टा ने राज्य सरकार द्वारा हाल ही में असिसटेंट प्रोफेसर समूह क हेतु रिक्त पदों के भर्ती के लिए जारी  आवश्यक मानदंडों को बेरोजगारों के अहित में बताया है सांसद ने कहा कि राज्य के  बेरोजगारों द्वारा इसे यूजीसी नियमों के तहत बदलने की मांग की जा रही है । जोकि जायज है । सांसद का कहना है कि सरकार द्वारा निर्देशित मानकों का यहां के अभ्यर्थियों को नुकसान होगा ।

आइये समझते हैं पूरा मामला

दरसल हाल ही में राज्य सरकार ने उच्च शिक्षा में असिस्टेंट प्रोफ़ेसर समूह क के लिए भर्तियां निकाली हैं जिसमे  मांगी गई शर्तों के अनुसार कहा जा रहा है कि राज्य के मेधावी और बेरोजगारों को अर्हता पूर्ण करने में दिक्कत आ सकती है । जबकि देश के अन्य राज्यों में यूजीसी की गाइडलाइन और 2018 असिस्टेंट प्रोफेसर की नियुक्ति के लिए निर्देशित शर्तों में 2023 तक दी गई छूट के अनुसार भर्ती प्रकिर्या करा रहे हैं ।

सांसद कहते हैं …

उत्तराखण्ड भाजपा सरकार किस तरह से राज्य के युवाओं के भविष्य के साथ खिलवाड़ कर रही है यह समझना भी जरूरी है । भाजपा सरकार के एक गलत फ़ैसले के कारण राज्य के कई उच्च-शिक्षित और मेधावी बेरोजगार युवाओं के सर पर अनिश्चितता की तलवार लटक रही है ।

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ज्ञात रहे कि उत्तराखण्ड भाजपा सरकार ने प्रदेश के राजकीय महाविद्यालयों में असिस्टेंट प्रोफ़ेसर (समूह-क) के रिक्त पदों हेतु भर्तियां निकालीं हैं । लेकिन अभ्यर्थियों की चयन हेतु इस बार परंम्परागत लिखित परीक्षा को आधार न बनाकर नये तरीके API (Academic Performance Indicator) को आधार बनाया है वह अन्यायपूर्ण है और उससे कई अभ्यर्थियों का भविष्य अन्धकारमय होने वाला है ।

विश्वविद्यालय अनुदान आयोग (University Grants Commission) की नियमावली के अनुसार उक्त पदों हेतु आवेदन करने हेतु न्यूनतम योग्यता NET (National Eligibility Test) अथवा SET (State Eligibility Test) का होना आवश्यक है ।

गौरतलब है कि UGC के 2018 के एक सर्कुलर के मुताबिक API (Academic Performance Indicator) आधार बनाने की बाध्यता केवल विश्वविद्यालयों में निकाली गई भर्तियों हेतु रखी गई थी । जिसे जुलाई 2021 को लागू किया जाना था । लेकिन कोविड महामारी को ध्यान में रखते हुये UGC ने इस बाध्यता को जुलाई 2021 की समय सीमा निरस्त करते हुये इसे जुलाई 2023 तक आगे बढ़ा दिया है ।

लेकिन यहां पर ध्यान देने योग्य बात यह भी है कि UGC के 2018 वाले सर्कुलर के मुताबिक राज्यों को यह स्वतंत्रता प्रदान की गई है कि वह अपने महाविद्यालयों में चयन परीक्षा की प्रक्रिया का निर्धारण स्वयं कर सकता है। अर्थात प्रदेश सरकार चाहे तो परंपरागत तरीके लिखित परी अथवा API (Academic Performance Indicator) दोनों में से किसी को भी चयन प्रक्रिया हेतु प्रयोग कर सकती है । लिहाजा उत्तर-प्रदेश, मध्यप्रदेश, राजस्थान, हरियाणा, पंजाब, दिल्ली, हिमाचल तथा अन्य सभी राज्यों में चयन प्रक्रिया हेतु Academic Performance Indicator को आधार न मानते हुये परम्परागत लिखित परीक्षा को ही आधार रखा है ।

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आईये समझते हैं कि API (Academic Performance Indicator) द्वारा चयन प्रक्रिया अन्यायपूर्ण कैसे है ?

UGC की नियमावली के अनुसार महाविद्यालय में असिस्टेंट प्रोफ़ेसर के पद के आवेदन हेतु NET/SET/JRF/Ph.D में से किसी भी एक का होना आवश्यक है । यहां पर यह समझना भी जरूरी है कि NET (National Eligibility Test) क्वालीफ़ाईड अभ्यर्थी देश के किसी भी महाविद्यालय में असिस्टेंट प्रोफ़ेसर के पद के लिये आवेदन कर सकते हैं लेकिन SET (State Eligibility Test) क्वालीफ़ाईड केवल और केवल अपने प्रदेश के महाविद्यालयों में ही असिस्टेंट प्रोफ़ेसर के पद हेतु आवेदन कर सकते हैं ।

API (Academic Performance Indicator) के अनुसार अभ्यर्थी को उसकी डिग्रियों और प्राप्तांके आधार पर नंबर देकर मेरिट तैयार की जाती है । जिसमें निम्नानुसार अंक दिये जाते हैं :

1 – यदि ग्रेजुएशन में प्राप्तांक प्रतिशत 60% से 80% है तो — 19 अंक
2 – यदि ग्रेजुएशन में प्राप्तांक प्रतिशत 55% से 60% है तो — 16 अंक
3 – यदि ग्रेजुएशन में प्राप्तांक प्रतिशत 45% से 55% है तो — 10 अंक
4 – यदि पोस्ट-ग्रेजुएशन में प्राप्तांक प्रतिशत 60% से 80% है तो — 23 अंक
5 – यदि पोस्ट-ग्रेजुएशन में प्राप्तांक प्रतिशत 55% से 60% है तो — 20 अंक
6 – Ph.D — 25 अंक
7 – NET — 08 अंक
8 – JRF — 10 अंक
9 – प्रत्येक शोध पत्र — 02 अंक

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सारणी देखकर साफ़ दिखाई देता है कि API स्कोर के माध्यम से केवल उन्ही अभ्यर्थियों को लाभ मिलेगा जिनके पास Ph.D है । क्योंकि Ph.D के API स्कोर 25 के सापेक्ष NET/JRF का API स्कोर 08/10 अंक है, जो कि बहुत कम है । जाहिर है कि API (Academic Performance Indicator) चयन प्रक्रिया के द्वारा राष्ट्रीय स्तर पर प्रतिस्पर्धा के NET/JRF वाले अभ्यर्थियों के चयन की बहुत कम संभावनायें रह जाती हैं ।

अत: सरकार को चाहिये चयन प्रक्रिया को ऐसा पारदर्शी बनाये कि किसी भी अभ्यर्थी के साथ अन्याय न हो । परंपरागत लिखित एवं साक्षात्कार का प्रारूप पड़ोसी राज्यों की तर्ज पर पुन: लागू किया जाये । चूंकि UGC ने 2018 के सर्कुलर के अनुसार Ph.D एवं API की बाध्यता को जुलाई 2023 तक निरस्त कर दिया है तो उसी सर्कुलर को अमल में लाया जाये ।

हिलवार्ता न्यूज डेस्क की रिपोर्ट 

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