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जनांदोलन का पर्याय शमशेर. जी हाँ अगर यह शमशेर सिंह बिष्ट के लिए कहा जाय तो अतिश्योक्ति नहीं होगी, शमशेर दा की आज पहली पुण्यतिथि है उनके बहाने अलमोड़ा में आज जनसंघर्षों से जुड़े उनके साथी जुटे हैं उनको, उनके संघर्षों को याद किया जा रहा है और साथ ही हासिये पर जा रहे सामाजिक आंदोलनों को पुनर्जीवित करने की कोशिश भी.

आगे क्या होगा कहा नहीं जा सकता है,एक शख़्स जिसने अपनी जिंदगी,आम आदमी की बेहतरी,राज्य के सरोकारों को जिंदा रखने को समर्पित कर दी,वह शमशेर । यह उनके और उनके साथियों द्वारा किये संघर्षों का प्रभाव है कि आज भी लगता है कि तमाम विपरीत हालात के वावजूद ठीक हो सकता है हाँ इसलिए कि जो नायकत्व उस दौर में शमशेर दा और साथियों ने दिया,आज भी आपके अंदर जोश पैदा करता है,कि संघर्षों की यादें पुनः ताकत बन सकती है.
अलग अलग धाराओं के लोग अलमोड़ा में इकट्ठा होकर संघर्ष के इस योद्धा को श्रद्धांजलि के बहाने राज्य की बेहतरी के रास्ता तलाशने की कोशिश कर रहे हैं. पिछले वर्ष 22 सितंबर को शमशेर दा ने लंबी बीमारी के बाद इस दुनिया को अलविदा कह दिया था.
उनके संघर्षों की लंबी फेहरिस्त है 1974 में अलमोड़ा संगठक महाविद्यालय के अध्यक्ष चुने जाने के बाद जिस तरह उन्होंने ताउम्र छात्र नौजवानों मजदूर किसानों के लिए संघर्ष किया, यह किसी मिशाल से कम नहीं, राज्य आंदोलन के साथ साथ उत्तराखंड में हुए किसी भी जनांदोलन में शमशेर दा की मौजूदगी ना हो ऐसा हो ही नहीं सकता है.गढ़वाल कुमायूँ के बीच राजनीतिक रिश्ता शायद शमशेर दा जैसे नायकों की सबसे बड़ी कामयाबी कही जा सकती है.
उत्तरप्रदेश के समय कालापानी समझे जाने वाले इन दोनों मंडलों का आपस मे किसी तरह का संवाद नहीं था राजनीतिक दलों जिसमे अधिकतर समय कांग्रेस का वर्चस्व रहा ने राजनीतिक फायदे के लिए सांस्कृतिक एकरूपता होते हुए दोनो मंडलों के आम लोगों को एक दूसरे से बांटे रखा, बड़े नेता जरूर आपस मे जुड़े रहे, लेकिन आम आदमी के बीच हमेशा गहरी खाई पैदा की जाती रही.
इस खाई को पाटने का श्रेय शमशेर दा और उनके संघर्षशील साथियों को जाना चाहिए ही, जिन्होंने चिपको,सहित टिहरी बांध विरोध,नशा नहीं रोजगार दो,अस्कोट आराकोट यात्रा,या नंदा राज जात यात्रा के जरिये दोनो मंडलों के आम लोगों को साथ खड़ा किया,एक दूसरे के मन मे राज्य की परिकल्पना का बीज बोया ही नहीं यह विश्वास पैदा किया कि एक दिन उनको अपने सपनो का राज्य मिल सकता है,यही कोशिशें कालांतर में राज्य आंदोलन के रूप में उभरी,शमशेर दा और उनके साथियों जिसमे अधिकतर बाद में उत्तराखंड क्रांतिदल में शामिल हुए ने एकता की पटकथा लिखी यह महत्वपूर्ण कड़ी है .

छात्र आंदोलन के अग्रणी रहते हुए शमशेर दा ने सर्वप्रथम गढ़वाल मंडल के महाविद्यालाओं के छात्रसंघों सहित आम छात्र को धार देने का महत्वपूर्ण काम किया, उनका मानना था कि आंदोलन में छात्रों की भूमिका अहम है बड़े बदलाव बिना छात्रों को साथ लिए नही हो सकते हैं इसलिए उत्तराखंड के लगभग अधिकतर महाविद्यालाओं कालेजों मे छात्र संघों में उनके साथी चुनाव लड़े जीते और जनांदोलनों में भागीदार बने.
चाहते तो शमशेर दा समकालीन नेताओं से नजदीकी कर विधायक, सांसद, बन सकते थे,उन्होंने सँघर्ष का रास्ता चुना साथ ही उन्हें चरण वंदना से परहेज था,इसलिए भी आम आदमी के पक्ष में खड़ा होना शमशेर दा ने ज्यादा मुनासिब समझा,और वह एक उम्दा लेखक,पत्रकार,चिंतक,और संघर्षशील साथी के तौर पर किसी भी पद से बड़े निकले,और उन्होंने साबित किया कि यूं ही उनके साथी उन्हें संघर्षों के नायक के रूप में इकट्ठा नही हो रहे,उनकी शालीनता के जितने कायल और उतने ही जोश के,सबको जोड़ना लड़ने को प्रेरित करना यह बताने को काफी है कि आज उनकी पुण्यतिथि पर फिर उनके साथी अलमोड़ा में इकट्ठा हो उनके संघर्षों को याद ही नही कर रहे संघर्ष के तरीके तलाश रहे हैं.
इसलिए हम कह सकते है,साम,दाम,तिकड़मों,गुणा,गणित समीकरणों से विधायक सांसद बनना आसान है,शमशेर बनना कठिन.
हिलवार्ता की ओर से शमशेर दा को श्रद्धा सुमन.
ओ पी पांडेय
@ एडिटर्स डेस्क
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