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Doctors Day : देश में डॉक्टर्स डे मनाने की शुरुआत 1 जुलाई 1991 से की गई थी. यह दिन डॉ. बिधान चंद्र रॉय को समर्पित किया गया है । जानकारी के अनुसार, बी.सी.रॉय का जन्म 1 जुलाई 1882 में हुआ था । दरअसल, राष्ट्रपिता महात्मा गांधी का इलाज करने वाले डॉ. बिधान रॉय ने स्वास्थ्य के क्षेत्र में काफी योगदान दिया था. उनके इसी योगदान को सम्मान देने के लिए 1 जुलाई को ‘डॉक्टर्स डे’ मनाया जाता है । साथ ही 1975 से चिकित्सा, विज्ञान, दर्शन, कला और साहित्य के क्षेत्रों में अद्भुत काम करने वालों को भी हर साल बी.सी.रॉय पुरस्कार से नवाजा जाता है ।

इस वर्ष आईएमए ने डाक्टर्स डे को अग्रिम मोर्चे पर फैमिली डॉक्टर थीम के साथ मनाए जाने की घोषणा की है । डॉक्टर डे पर देहरादून स्थित कोरोनेशन जिला अस्पताल के सीनियर फिजिशियन डॉ एन एस बिष्ट द्वारा डाक्टर्स डे की ईव पर चिकित्सा पेशे और पेशेवरों पर एक आलेख संपादित किया है जिसे हिलवार्ता में माध्यम से हम आप तक पहुँचा रहे हैं आइये पढ़ते हैं ..

वर्ष 2022 में “सफेद कोट में नायक” 2022 की डॉक्टर्स डे की थीम है. – अग्रिम मोर्चे पर फॅमिली डॉक्टर। यह सच है कि कोविड-19 से लड़ाई में सफेद कोट वाले सूरमा साबित हुए हैं, लेकिन टीस इस बात की भी है कि भारत में सफेद कोट के ये नायक रोलमॉडल या प्रेरणास्रोत बनने की दौड़ में अभी भी काफी पीछे छूटे हुए हैं ।भारत में एक अनुमान के अनुसार 50 लाख लोग प्रतिवर्ष चिकित्सकीय लापरवाहियों की वजह से अपनी जान गँवा देते हैं जो कि अमेरिका के लिए महज चार लाख है। प्रशिक्षण और सलूक की कमी को इसके लिए जिम्मेदार माना गया है। हालांकि इस अवांछित मृत्युदर को घटाना सीधे-सीधे डॉक्टरों के हाथ में नहीं है। उसके लिए जरूरी बजट-खर्च और प्रशिक्षण में विशेषज्ञता और उत्कृष्टता लाने की जरूरत होगी। और उस खाई को पाटने की जरूरत भी होगी जो 14 लाख डॉक्टरों की कमी से जुड़ी है, ज्ञात रहे कि भारत मे 7000 में 1 डॉक्टर है जिसे बढ़ाये जाने की जरूरत है ।

मौलिक तौर पर ऐसा माना जाता है कि चिकित्सक अपने व्यवहार या व्यवहार में बदलाव लाकर भी समाज की स्वास्थ्यरक्षा कर सकते हैं ।आधुनिक युग में जब डॉक्टर की उपाधि फिजीशियन या मेडिकल डॉक्टर के समानार्थी हो चुकी है तो डॉक्टरों से यह अपेक्षा और भी ज्यादा की जाएगी कि वो समाज के स्वास्थ्य के रोलमॉडल बन कर भी दिखाएं।

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डॉ बिष्ट आगे लिखते हैं ....
” डॉक्टर ” उपाधि असल में डाक्टरों पर उधार है, कोई खालिस उपहार नहीं। ऐतिहासिक रूप से तेरहवीं शताब्दी में यह विद्यामूलक उपाधि यूरोप से शुरू हुई जो मूलतः न्यायविदो को मिलती रही । डॉक्टर शब्द का अभिप्राय तब शिक्षक तक सीमित था। डॉक्टरेट या डॉक्टोरल डिग्री धारकों को यह उपाधि प्रदान की जाती । अंग्रेजीभाषी देशों में चिकित्सक भी डॉक्टर का एक दूसरा अर्थ कालांतर में जुड़ता गया ।भारत में डॉक्टर की उपाधि लगाने वालों में पीएचडी होल्डर के साथ-साथ दंतचिकित्सक, आयुर्वेद, यूनानी इत्यादि के भी डॉक्टर हैं ।तो भी अंग्रेजी का शब्द होने के कारण आमजन की नजर में डॉक्टर का अभिप्राय एमबीबीएस या समकक्ष की ट्रेनिंग पाए व्यक्ति से है। फिजिशियन शब्द ९०० साल पुराना है जिसका अर्थ मेडिकल डॉक्टर है। किंतु भारत की स्वास्थ्य सेवाओं में एमडी मेडिसिन डिग्री धारक के लिए ही विशेषतः प्रयुक्त होने लगा है।
ऐतिहासिक रूप से ही डॉक्टर उपाधि को धारण करने वाले व्यक्तियों के आचार व्यवहार को समाज में ऊंची नजर से देखे जाने का चलन रहा है। जाहिर है कि ऐसे व्यक्तियों का आचरण रोल मॉडल की तरह लिया जाता है।आज के दौर में मेडिकल डॉक्टर ही “डॉक्टर”है ,और उसी के कंधों पर प्रेरणास्रोत बने रहने का भार भी। पाश्चात्य शैली के आधुनिक रहन-सहन में जिसमें पदार्थ उपयोग अथवा सब्सटेंस यूज भी शामिल है, रोलमॉडल बने रहने की चुनौती डॉक्टर पर पहले से और भी ज्यादा है।

डॉक्टर की ऊंची सामाजिक हैसियत होती है और वह एक प्रबुद्ध पेशे के सदस्य होते हैं। व्यवसायिक,सामाजिक, आर्थिक सुरक्षा से उनका स्तर परिपूर्ण माना जाता है।इसके पीछे कारण भी है। डॉक्टर का उच्चस्तरीय प्रशिक्षण और उसके साथ जुड़ी मानवीय और वैधानिक जिम्मेदारियां उसकी हैसियत में इजाफा करती हैं। ऊंची सामाजिक स्थिति के होने के कारण डॉक्टर से यह अपेक्षा नहीं की जाती कि वो धनलोलुप हो अथवा व्यसनों और भ्रष्टाचार में लिप्त हो। इसके पीछे एक संदर्भ यह भी है कि डॉक्टरों पर उनकी डॉक्टर उपाधि उधार स्वरूप है – यह उपाधि कई तरह के शास्त्रों और विज्ञानों की पीढ़ियों से उन तक छन कर आयी है। अतः यह उपाधि हजारों वर्षों के शास्त्रमंथन की उपज है। अमृत के कण की तरह देवाचरण वाले ही इसका रसास्वादन कर सकते है, ऐसा ही सर्वसम्मत है। यों ही नहीं महान दार्शनिक फ्रेडरिक निचे ने खुद को फिजीशियन कहा और फिजिशियन को फिलोसाॅफर की संज्ञा दी।
अब चूंकि उपभोक्तावाद चरम पर है ,प्रतिष्ठा से अधिक पैसा कमाने की दौड़ है, तो डॉक्टरों के पास इस भीड़भाड़ वाले देश में वक्त नहीं है – न मरीज के लिए न खुद के लिए। 1 जुलाई को डॉक्टर्स डे के दिन असल में डॉक्टर्स नाइट होगी जब दिन भर के थके हारे डॉक्टर अपनी मेहनत का जश्न मनाते हुए विश्रांतिलाभ करेंगे।डॉक्टर्स के इन समारोहों में खूब प्रशस्ति वितरण भी होंगे ज्यादा जुड़ाव,मोलभाव,दबाव और प्रभाव के लिए।
२०१७ में आईएमए ने वैधानिक चेतावनी जारी करके डॉक्टरों से गैरपेशेवरों के साथ मद्यपान न करने की सलाह दी थी। जाहिर है कि शीर्ष संस्था को इस बात की चिंता थी कि अविश-जनों के सामने डॉक्टरों का व्यसन करना उनके रोलमॉडल वाले रूप के अनुरूप नहीं है। हालांकि डॉक्टरों में मौजूद मद्यपान और धूम्रपान की लत और उसके दुष्प्रभावों के प्रति सचेत करने के लिए शीर्ष निकाय ने अपने आप को असमर्थ ही पाया।

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सफेद कोट के नायकोऺ ने कोविडकाल में थोड़ा बहुत अपनी प्रतिष्ठा में इजाफा किया – जान जोखिम में डालकर, जनजागरूकता का भार अपने कंधों पर उठाकर। इस दौरान डॉक्टरों में व्यायाम, कम- मद्यपान और धूम्रपान निषेध की रूचि भी दिखाई दी। कुछ हद तक फिजिशियन-हीरो पुनर्जीवित हो उठा। हजारों डॉक्टरों ने अपनी जानें भी गंवाई लेकिन वो अनुपातिक रूप से उस मृत्युदर के सामने कहीं नहीं ठहरता जो मद्यपान और धूम्रपान के चलते चिकित्सा कर्मियों में पाई जाती है। व्यावसायिक तनाव के चलते डॉक्टरों में आत्मघात,सड़क दुर्घटना, हृदयाघात, स्ट्रोक से होने वाली मृत्युदर अधिक आंकी गई है।

जैसा की पूर्व में कहा गया है कि डॉक्टरों पर डॉक्टर की उपाधि उधार है क्योंकि यह मूल रूप से वकीलों,धर्मशास्त्रियों को मिलने वाली उपाधि है तथा जिसके चलते समाज डॉक्टरों से कुछ अधिक नैतिक और मानवीय अपेक्षाएं रखता है। अगर इतिहास में बार-बार नहीं पीछे झांकेंगे तो डॉक्टर यह नहीं देख और समझ पाएंगे कि डॉक्टरी की पढ़ाई एक तरफ और डॉक्टर की उपाधि अन्य तरफ है। डॉक्टरी अर्जित की जा सकती है यानि कि डॉक्टर की डिग्री। किंतु डॉक्टर की उपाधि तारीख या इतिहास के गहरे मंथन की देन है। जो डॉक्टर सोचते हैं कि नैतिकता का बोझ उन पर ही क्यों लादा जाये,वो ही क्यों मरीजों के लिए मुफ्त में परेशान हों – उनको तारीख से फिर रूबरू होने की जरूरत है। उनको समझने की जरूरत है कि भले ही सफेद कोट पर शराब और धूम्रपान की बूंदों और राख का दाग न टिकता हो उसकी गंध और उससे उपजा वातावरण दूर तक महसूस होता है। और उधार की उपाधि जिसको उन्होंने उपहार की तरह ओढ़ा है तथा जो स्पिरिट से हाथ धोने तक सीमित है उस पर अय्याशी और अतिरेक का संशय पैदा करता है।

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पश्चिम में धूम्रपान करने वाले डॉक्टरों का अनुपात बेहद कम है। ऐसा शायद खुद की शिक्षाप्रणाली पर भरोसा और पेशेवर जिंदगी पर गर्व की वजह से हो। भारत के आठ मेडिकल कॉलेजों में हुई स्टडी के अनुसार युवा चिकित्सकों में धूम्रपान का प्रतिशत 17.5 के बराबर है जो कि सामान्य वर्ग के युवाओं के 21.5 प्रतिशत से थोड़ा ही कम है। एमबीबीएस के 8 प्रतिशत और पीजी के 16.6 प्रतिशत डॉक्टर्स धूम्रपान करते पाए गए।शराब सेवन में एमबीबीएस के 16.6 तथा पीजी के 31.5 प्रतिशत डॉक्टर रत रहे। भारत के ही एक अन्य अध्ययन के अनुसार( जिसमें दो सौ पैंतीस अलग-अलग प्रतिभागी शामिल रहे )केवल 18 प्रतिशत डॉक्टर ही शराब का सेवन नहीं करते पाए गए। विश्व स्वास्थ्य संगठन के अनुसार भारत में ३० प्रतिशत डॉक्टर्स तंबाकू का सेवन करते हैं।

बस केवल एक सुकून भरी बात है की मर्यादा और परंपरा अथवा लैंगिग कारणों से व्यसनरति भारतीय महिला चिकित्सकों में अत्यंत कम है।असल में 2022 की डॉक्टर्स डे की थीम “सफेद कोट में नायक” की सही हकदार वही हैं और यह थीम इस तरह से ही पढ़ी जा सकती है –
“सफेद कोट में नायिका” – ताकि पुरुष डॉक्टरों में चेतावनी और स्पर्धा का एहसास हो।और वो भी जनस्वास्थ्य के रोलमॉडल बनने में अपनी ली हुई शपथ निभा सकें ? यह प्रतिज्ञा जरूरी है कि डॉक्टर मद्यपान और धूम्रपान से जितना हो सके दूर रहें ।

डॉ बिधान चंद्र राय की स्मृति में मनाए जाने वाले डॉक्टर्स डे के दिन से अगर कोई प्रतिज्ञा ले सके तो यही उन्हें सही मायने में श्रद्धांजलि होगी ।

हिलवार्ता न्यूज डेस्क की रिपोर्ट

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