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पांच राज्यों में विधानसभा चुनाव की तिथि सामने आने के बाद  शोशल मीडिया में प्रचार प्रसार जोर पकड़ने लग गया है । चुनाव आयोग ने कोविड मामलो को देखते हुए अधिकतर चुनाव प्रचार गैरपारंपरिक यानी सोशल मीडिया में करने की सलाह के बाद आईटी सेल सक्रिय हो रहे हैं इधर देखा साफ देखा जा सकता है कि वक्त की नजाकत को समझते हुए सोशल मीडिया से दूरी रखने वाले नेताओं ने खुद का अकाउंट सक्रिय कर लिया है । शुरुवाती रुझान से स्पष्ट होता है कि इस बार भी बड़ा चुनावी मुद्दा हर बार की तरह भृष्टाचार ही होगा ।

उत्तराखंड की हर बार हुए सत्ता परिवर्तन को समझने के लिए फ्लैश बैक करना होगा । राज्य गठन के बाद हुए 2002 में विधानसभा चुनावों से लेकर आज 2022 तक दोनों दलों ने एक दूसरे के खिलाफ घोटालों के आरोप लगाए लेकिन 20 साल के इतिहास में किसी भी बड़े मुद्दे पर कार्यवाही नही हुई । कार्यवाही अगर हुई भी है तो छोटे कर्मचारी के निलंबन तक सीमित । बड़ी मछलियां हमेशा सुरक्षित रही । जबकि छात्रवृत्ति  कुम्भ, फर्जी कोविड टेस्टिंग जैसे मुद्दे बड़े संरक्षण के बिना संभव नही ।

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पहली निर्वाचित सरकार बनने से पहले कांग्रेस ने अंतरिम सरकार पर कई घोटालों का आरोप जड़ा लेकिन सत्ता प्राप्ति के बाद कांग्रेस को मानो सांप सूंघ गया । तत्तकालीन सरकार के मुखिया द्वारा 300 लालबत्ती बाटें जाने को लेकर विपक्षी भाजपा लाल हुई इसी साल भाजपा ने कांग्रेस पर 56 घोटाले करने का आरोप लगाया और जोर शोर से प्रचारित किया कि घोटालेबाज भीतर होंगे । तीखे चुनाव प्रचार की वजह एनडी सरकार की हार और फिर भाजपा को सत्ता का सुख मिला । लेकन पूरे पांच साल ने 56 घोटालों को छोड़िए भाजपा खुद ही आपस मे लड़ती रही । यहां सत्ता के खिलाफ अंदरूनी कलह ने राज्य को पांच साल में तीन मुख्यमंत्री दिखाए ।पहले खंडूरी फिर निशंक फिर दुबारा खंडूरी । कांग्रेस ने इसे मुद्दा बनाया और खंडूरी हैं जरूरी का नारा फेल हुआ कांग्रेस सत्ता में काबिज हो गई । 2012 में जीत हासिल करने में फिर से कांग्रेस ने भाजपा सरकार के घोटालों को चुनावी मुद्दा बनाया जिसमे स्टरजिया,कुंभ पनबिजली जैसे मुद्दे छाए रहे । 2012 से 2017 तक कांग्रेस ने भी लगाए गए आरोपों पर एक कदम भी आगे नही बढ़ाया ।

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भाजपा ने कांग्रेस पर केदारनाथ आपदा सहित कई घोटालों के आरोप लगाए तब कांग्रेस के मुख्यमंत्री बहगुणा थे जिन्हें कांग्रेस ने हटाया और हरीश रावत को राज्य की कमान सौप दी । नए राजनीतिक घटनाक्रम में बहुगुणा सहित कई कांग्रेसी भाजपा के साथ चल दिए । भाजपा में जाते ही आपदा घोटाले के आरोप भी दफन हो गए । लेकिन भाजपा ने हरीश रावत की घेरेबंदी शुरू कर दी । एफएलटू और स्टिंग मामले को जोर शोर से उठाया और 2017 ने प्रचंड बहुमत से सरकार बनाई । पहले चार साल त्रिवेंद्र के हाथ सत्ता रही । त्रिवेंद्र रावत के खिलाफ यहां कांग्रेस से ज्यादा भाजपा की अंतर्कलह जारी रही और उन्हें पद से हटा दिया गया । अल्प समय के लिए तीरथ सिंह और आखिरी ने पुष्कर सिंह धामी को कुर्सी मिली ।

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कांग्रेस फिर भाजपा के तीन मुख्यमंत्री बनाये जाने को भुनाने की कोशिश में है । लेकिन उसकी धार 2012 की तरह की नही दिखती। सरकार को घेर रही कांग्रेस ने विश्वविद्यालयों सहित विधानसभा में नियुक्तियों में अनियमितता के आरोप लगाए हैं । अब देखना होगा कि पिछली चार बार की तरह इस बार भी दोनों दलों के आरोप सत्ता प्राप्ति तक ही सीमित रहने वाले हैं कि कोई कार्यवाही भी होगी । जानकर मानते हैं कि उत्तराखंड में बीस साल से काबिज  दोनों दलों की हालत कमोबेस एक से हैं इसलिए उम्मीद कम ही है ।

हिलवार्ता न्यूज डेस्क 

 

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