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देहरादून : विगत 21 साल से उत्तराखंड में लोग बेहाल स्वास्थ्य सुविधाओं से जूझ रहे हैं । पर्वतीय जिलों में कई पीएचसी सीएचसी विशेषज्ञ चिकित्सकों विहीन हैं । अस्पताल सुविधाओं से वंचित हैं चिकित्सक कई दिक्कतों के वावजूद सेवाएं दे रहे हैं । वर्ष 2012 में  एम्स ऋषिकेश  की स्थापना हुई जिसके बाद एक आश जगी थी कि राज्य की गरीब जनता को राहत मिल सकेगी । लेकिन जिस तरह की घटनाएं बनने के बाद से ही हो रही है वह चिन्ताजनक है । संस्थान में गड़बड़ी की  खबरें काफी समय से सुर्खियों में हैं । राज्य सरकार की नाक के नीचे इन संस्थाओं में जिस तरह की अनियमितताएं आए दिन सामने आ रही हैं, यह समझने के लिए काफी है कि राज्य की दशा और दिशा किस ओर जा रहा है ।

अपने निर्माण के 10 साल बाद संस्थान में सीबीआई की रेड पड़ गई । सीबीआई रेड  भ्र्ष्टाचार और अनियमिताओं के कारण पड़ी है  । दरसअल कई सामाजिक तथा राजनीतिक संगठनों ने पूर्व निदेशक रविकांत द्वारा भर्तियों तथा सामग्री खरीद में कथित रूप से धांधली के आरोप लगाए थे । जिसके बाद सीबीआई द्वारा कार्यवाही को अंजाम दिया जा रहा है । सीबीआई जांच में निदेशक और उसके मातहत कई अधिकारियों की धीरे धीरे कई माध्यमों के जरिए घोटालों की परतें खुल रही है ।

एम्स सूत्रों  अवगत हुआ है कि जांच एजेंसी सीबीआई  ने सभी महत्वपूर्ण दस्तावेजों का अपने कब्जे में ले लिए हैं और जांच जारी है । हार्ड डिस्क में मौजूद डाटा को एकत्र करने के लिए विभिन्न अनुभागों में कंप्यूटर सिस्टम को खंगाला जा रहा है। जिसमे आरोपों के अनुसार साक्ष्य तलाशे जा रहे हैं ।

आइए विस्तार से जानें कौन है डॉ रविकांत

डॉ रविकांत किंग जार्ज मेडिकल यूनिवर्सिटी लख़नऊ के वीसी रहे हैं 2014 में उनकी नियुक्ति बतौर वीसी हुई । डॉ रविकांत को मेडिकल क्षेत्र में सेवा हेतु भारत सरकार ने पद्म श्री से नवाजा है । लेकिन उनके कारनामों जैसा कि लखनऊ और अब ऋषिकेश में अब सामने आ रहा है की जांच की सुई उनकी तरफ़ घूम चुकी है जांच के बाद यह स्पष्ट हो जाएगा कि उन्हें मिले इस सम्मान के वह  काबिल हैं भी की नहीं । डॉ रविकांत पद सम्हालने के बाद केजीएमयू में विवादों में घिरे रहे । रविकांत के खिलाफ केजीएमयू की टीचर्स यूनियन ने मनमानी से नियुक्ति करने उपकरण और अन्य सामग्री खरीद में घोटालों के आरोप जड़ दिए । यही नही यूनियन ने साक्ष्यों सहित बताया कि वीसी रविकांत ने अपने चहेतों को संस्थान में महत्वपूर्ण पदों पर आसीन किया । उनके द्वारा उपकरण खरीद से लेकर की गई नियुक्तियाँ नियम विरुद्ध हैं ।

अब सवाल यह है कि जब डॉ रविकांत के खिलाफ केजीएमयू में कई तरह के आरोप थे तो कैसे उन्हें ऋषिकेश एम्स का निदेशक बना दिया गया । यह भी एक जांच का विषय है ।

बहरहाल  इस सब के वावजूद 2017 में उन्हें एम्स की कमान सौप दी गई।  डॉ रविकांत का एम्स में कार्यकाल 4 साल रहा  यहां भी उन पर अपने चहेते लोगों के माध्यम से मुखबिरी करवाने । कर्मचारियों को नियम विरुद्ध नियुक्ति देने । आउटसोर्स कर्मचारियों को बिना किसी नियम नियुक्ति देना सहित कई आरोपों से रूबरू होना पड़ा । चार साल के कार्यकाल के बाद उपनपर केजीएमयू की तर्ज पर ऋषिकेश में भी घोटालों का आरोप लगा है ।  आरोप यहां भी लखनऊ की तर्ज ही हैं कि चहेतों को महत्वपूर्ण पदों पर बिठाने, उपकरण खरीद में गड़बड़ी,नियुक्ति में मानकों की अनदेखी  नर्सेज नियुक्ति वह भी अधिकांश एक ही राज्य , स्टेनोग्राफर भर्ती घोटाला सहित एक ही परिवार के 6 लोगों  की नियुक्ति भी शामिल हैं ।
इधर सीबीआई के पास मामला आने के बाद एक बड़ा खुलासा और हो गया है जब पता चला कि संस्थान के लिए  चयनित 800 नर्सिंग स्टाफ के पदों के लिए 600 लोग एक ही राज्य के राजस्थान से हैं । जबकि उत्तराखंड के बेरोजगार कई समय से रोजगार की मांग कर रहे हैं। राज्य में हजारों पद खाली हैं ।

हालांकि डॉ रविकांत  एम्स से  सेवानिवृत्त हो गए हैं । उनके पद पर रहते किसी तरह की जांच नही की गई वावजूद इसके कि उनकी जॉइनिंग के बाद से ही आरोप लगने लगे थे ।  खबर है कि निदेशक के मातहत हुए कई आरोपों की तहकीकात के बाद  एजेंसी जल्द ही बड़ा खुलासा कर सकती है ।

राज्य निर्माण के 21 साल में जहां आम लोगों को नौकरी के लिए सड़कों पर आंदोलन करने को मजबूर होना पड़ा है । वहीं एम्स जैसे बड़े संस्थानों में अवैध तरीके से कई लोग नौकरी पाने में सफल हुए हैं । राज्य में हर वर्ष रोजगार की तलाश में हजारों युवा परीक्षा में बैठ रहे हैं लेकिन नौकरी नहीं मिल पा रही है ।

राज्य में निरंतर नियुक्तियों में विवाद मानो नियति बन गया  ।  राज्य के कई कुलपतियों की नियुक्ति पर ही सवाल हैं । जिसमे श्रीदेव सुमन विश्वविद्यालय, टेक्निकल यूनिवर्सिटी, ओपन यूनिवर्सिटी सहित कई अन्य शामिल हैं । यही नहीं यहां विगत कई सालों से कई अवैध नियुक्तयों पर सवाल उठते रहे है ।  राज्य में 500 करोड़ रुपये से अधिक का छात्र वृति   घोटाला सामने आया लेकिन कोई बड़ी मछली पकड़ में नहीं आई है ।
घोटालों पर चुप्पी में सरकार की कोई मजबूरी रही ? एक विवादित अधिकारी को एम्स जैसे संस्थान में बिठाना किन लोगों के संरक्षण में हुआ यह भी एक जांच का विषय है लेकिन ?  अब देखना है इस मामले में क्या कुछ बाहर आता कि नहीं ?

हिलवार्ता न्यूज डेस्क 

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